कुछ विहग नीड से जब निकले ,
गुंजायमान भू-गगन हुआ.
मानो वसुधा के प्रांगण में
नवजीवन का आगमन हुआ।
कुछ खेचर ऊपर उड़े बहुत,
कुछ थककर भू पर पड़े रहे।
कुछ बाधाओं में भी अविचल ,
निर्भीक निरंतर खड़े रहे।
वो शाख हुई वीरान घोंसले
छिन्न-भिन्न हो टूट गए।
नभ को छू लेने की ज़िद में ,
संगी-साथी सब छूट गए।
सबने अपने-अपने हिस्से का
आसमान कब्जाया था।
नीचे सुकून की धरती को ,
कब का ही वो तज आया था।
जिन आकाशों का दर्शन भी ,
खग की आँखों को दुर्लभ था।
बंट चुका आज हो खंड- खंड ,
धरती के ऊपर का नभ था।
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