Wednesday, August 17, 2022

नभ की उड़ान

कुछ विहग नीड से जब निकले ,

गुंजायमान भू-गगन हुआ. 

मानो वसुधा के प्रांगण में  

नवजीवन का आगमन हुआ। 


कुछ खेचर ऊपर उड़े बहुत,

कुछ थककर भू पर पड़े रहे। 

कुछ बाधाओं में भी अविचल ,

निर्भीक निरंतर खड़े रहे। 


वो शाख हुई वीरान घोंसले 

छिन्न-भिन्न हो टूट गए। 

नभ को छू  लेने की ज़िद में ,

संगी-साथी सब छूट गए। 


सबने अपने-अपने हिस्से का 

आसमान कब्जाया था। 

नीचे सुकून की धरती को ,

कब का ही वो तज आया था। 


जिन आकाशों का दर्शन भी ,

खग की आँखों को दुर्लभ था। 

बंट चुका आज हो खंड- खंड ,

धरती के ऊपर का नभ था।  

 

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