Thursday, October 19, 2017

दिवाली - कुछ मुक्तक :



१.
दिए देहरी पर जलाना यकीनन ,
खिला देना तुम रोशनी की बहारें।
मगर देखना रह न बे -नूर जाए ,
कोई दिल का कोना, कोई मन का कोना।

२.
दीयों को फक्र था जलती हुई अपनी लौ पर ,
अँधेरे चीर कर जो रोशनी लुटाते थे।
मगर विद्युत् -जनित इस रोशनी के मेले में।
बुझे बुझे से ये जलते दिए भी दीखते हैं।
जलाता कौन है अब इनको तम मिटाने को ,
ये तो जलते हैं देहरी पे बस जलने के लिए।

३.
जब घोर निराशा की बदरी,
निज ह्रदयाम्बर पर छाई हो।
घनघोर अमावस की रजनी
जब वसुधा पर घिर आई हो।
ऐसे में कोई दीप जले,
अंतरमन हो जाये पुलकित।
जल उठे दिब्य इक 'ज्योति-पुंज',
वसुधा का कण कण हो दीपित।
उल्लास, प्रेम, आनंद, खुशी,
का मौसम धरती पर छाये।
जग में न छल कपट और द्वेष का
लेष मात्र रहने पाये।
संपदा सुपूरित वसुधा में
सर्वत्र सदा हरियाली हो।
हर घर में खुशी का दीप जले,
ऐसी ही हर दीवाली हो।

इस बार दिवाली कैसी हो ?



वर्षों -दशकों, जिन देहरियों पर
अंधकार ही छाया हो।
इस चकाचौंध की दुनिया में भी,
जो जीवन मुरझाया हो।
ऐसे उजडे उपवन में क्यूँ ना,
कोई फूल खिला आऐं?
कुछ दीप अंधेरी गलियों में भी,
आओ, आज जला आएं।

इस बार दिवाली ऐसी हो।

एक तरफ यहाँ पर दुनिया में,
है दौलत का अंबार खडा।
उस तरफ वेदना ग्रसित भीड से,
बोझिल हो रो रही धरा।
ये क्रूर विषमता मिट जाऐ,
धरती जन्नत सी लग पाये,
कुछ भाव, त्याग-अपनेपन की,
हर दिल में चलो जगा आयें।

इस बार दिवाली ऐसी हो।
घर खूब सजाना तन मन से।
रौशनी-रंग से भर देना,
वसुधा पर  सुंदर बनी रहे,
विस्मृत न इसे तुम कर देना।
"अब और नहीं, दूषित होगी,
धरती माता" ये प्रण गायें।
हम इसी भाव का दीप एक
हर दिल में चलो जला आऐं।

इस बार दिवाली ऐसी हो।

कलियुग में रावण और नहीं
"बस लालच, द्वेष, प्रदूषण है।"
छल , कपट ,क्रूरता रूप लिए ,
पथ पथ करता वह विचरण है। 
रे मनुज अवतरण यहाँ राम का,
बार बार ही क्या होगा?
'अब के रावण'  के हम्ही जनक,
राम भी हमें बनना होगा।

इस बार दिवाली ऐसी हो।