१.
दिए देहरी पर जलाना यकीनन ,
खिला देना तुम रोशनी की बहारें।
मगर देखना रह न बे -नूर जाए ,
कोई दिल का कोना, कोई मन का कोना।
२.
दीयों को फक्र था जलती हुई अपनी लौ पर ,
अँधेरे चीर कर जो रोशनी लुटाते थे।
मगर विद्युत् -जनित इस रोशनी के मेले में।
बुझे बुझे से ये जलते दिए भी दीखते हैं।
जलाता कौन है अब इनको तम मिटाने को ,
ये तो जलते हैं देहरी पे बस जलने के लिए।
३.
जब घोर निराशा की बदरी,
निज ह्रदयाम्बर पर छाई हो।
घनघोर अमावस की रजनी
जब वसुधा पर घिर आई हो।
निज ह्रदयाम्बर पर छाई हो।
घनघोर अमावस की रजनी
जब वसुधा पर घिर आई हो।
ऐसे में कोई दीप जले,
अंतरमन हो जाये पुलकित।
जल उठे दिब्य इक 'ज्योति-पुंज',
वसुधा का कण कण हो दीपित।
अंतरमन हो जाये पुलकित।
जल उठे दिब्य इक 'ज्योति-पुंज',
वसुधा का कण कण हो दीपित।
उल्लास, प्रेम, आनंद, खुशी,
का मौसम धरती पर छाये।
जग में न छल कपट और द्वेष का
लेष मात्र रहने पाये।
का मौसम धरती पर छाये।
जग में न छल कपट और द्वेष का
लेष मात्र रहने पाये।
संपदा सुपूरित वसुधा में
सर्वत्र सदा हरियाली हो।
हर घर में खुशी का दीप जले,
ऐसी ही हर दीवाली हो।
सर्वत्र सदा हरियाली हो।
हर घर में खुशी का दीप जले,
ऐसी ही हर दीवाली हो।