Monday, July 19, 2010

कवि के स्वप्न

और मैंने खीजकर तब लेखनी रख दी,
चित्र मन के हू-ब-हू खिचने न पाते थे,
बंद कर आँखें लगा कुछ सोचने बेबस,
लड़ खड़ा कर भाव मन मे उलझ जाते थे।

मौन मुझको देख बिजली कड़ककर बोली,
कौन तुम? क्यों पागलों सा खेल नित करते?
ब्यर्थ मन मे जब कभी उन्माद चढ़ आता,
कभी हंसते हो कभी खुद ही मचल पड़ते?

कुछ कहूं मैं कवल इसके कलम उठ बोली,
सहचरी घन की! मुझे पहचानती है तू?
मैं प्रलय की दूतिका नव श्रृष्टि भी मुझमे,
इस भुवन की स्वामिनी को जानती है तू?

मानती हूँ नित्य हैं हम खेल ही करते,
किन्तु यह सोचा की ये सब खेल है कैसा?
हम लहू की खाद पर हैं बो रहे सपने,
खेल कह देना इसे बेमेल है कैसा?

और फिर जिनको महज तुम खेल ही समझे,
याद रख वे एक दिन तूफ़ान लायेंगे।
कवि स्वप्न हो साकार बस एक बार तो जाए,
आसमा, तारे,जमी, सब बदल जायेंगे।

देखना फिर बादलों के अंचलों में छुप,
किस तरह हमने जमाने बदल डाले हैं।
किस तरह भू पर नया युग उतर आया है,
पागलों के कृत्य भी कितने निराले हैं।



Saturday, July 17, 2010

शून्य

शून्य तो वैसे स्वतः कुछ भी नहीं,
पर शून्य ही इस जगत का आधार है।

शून्य से ही श्रृष्टि की उत्पत्ति है,
शून्य ही ब्रह्माण्ड का विस्तार है।

शून्य से उत्पन्न सबकुछ, शून्य मे सब लीन है,
शून्य बिन सब तत्व कोरा और मतलब हीन है।

शून्य में मिल जाए लेकिन तो अखिल संसार है,
शून्य से कण-कण में गति, वर्ना जगत लाचार है।

सफ़र इस ब्रह्माण्ड का बस शून्य से है शून्य तक,
बीच में मिथ्या जगत का खेल होता है प्रकट,

खत्म इस माया-जगत का खेल कब हो जाएगा,
शून्य होगा शेष यह ब्रह्माण्ड थक सो जाएगा।

ईश्वर



वो चाहकर भी हर जगह पर हो नहीं सकता ।
पर दूर अपने जनों से रह तो नहीं सकता।
मिट जाय ऐसी उलझने इस बात की खातिर,
कुछ बना डाले नियम उसने शाश्वत आखिर।

बस इन्हीं की युक्ति से दुनियां चलाता है,
अहसास सबके पास होने  का दिलाता है।

ह्रदय का ब्यापार

हाय री दुनियां तुम्हारी भी अनोखी रीत है ।
पनप बढ़कर फूलफलकर मुरझ जाती प्रीत है ।
जिस चतुर रचना-कुशल से ह्रदय की रचना हुयी,
अतुर-आकुल ह्रदय में जिसनी बड़ी सी चाह दी ,
दिल लगी को तोड़ना क्यों बनाया उसने भला,
जोड़कर दिल तोड़ने का क्यों चलाया सिलसिला।
सच कहूं अब ह्रदय का मंहगा बड़ा ब्यापार है,
शुद्ध शाश्वत प्रेम कर पाना बड़ा दुश्वार है।