Monday, July 19, 2010

कवि के स्वप्न

और मैंने खीजकर तब लेखनी रख दी,
चित्र मन के हू-ब-हू खिचने न पाते थे,
बंद कर आँखें लगा कुछ सोचने बेबस,
लड़ खड़ा कर भाव मन मे उलझ जाते थे।

मौन मुझको देख बिजली कड़ककर बोली,
कौन तुम? क्यों पागलों सा खेल नित करते?
ब्यर्थ मन मे जब कभी उन्माद चढ़ आता,
कभी हंसते हो कभी खुद ही मचल पड़ते?

कुछ कहूं मैं कवल इसके कलम उठ बोली,
सहचरी घन की! मुझे पहचानती है तू?
मैं प्रलय की दूतिका नव श्रृष्टि भी मुझमे,
इस भुवन की स्वामिनी को जानती है तू?

मानती हूँ नित्य हैं हम खेल ही करते,
किन्तु यह सोचा की ये सब खेल है कैसा?
हम लहू की खाद पर हैं बो रहे सपने,
खेल कह देना इसे बेमेल है कैसा?

और फिर जिनको महज तुम खेल ही समझे,
याद रख वे एक दिन तूफ़ान लायेंगे।
कवि स्वप्न हो साकार बस एक बार तो जाए,
आसमा, तारे,जमी, सब बदल जायेंगे।

देखना फिर बादलों के अंचलों में छुप,
किस तरह हमने जमाने बदल डाले हैं।
किस तरह भू पर नया युग उतर आया है,
पागलों के कृत्य भी कितने निराले हैं।



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