शून्य तो वैसे स्वतः कुछ भी नहीं,
पर शून्य ही इस जगत का आधार है।
शून्य से ही श्रृष्टि की उत्पत्ति है,
शून्य ही ब्रह्माण्ड का विस्तार है।
शून्य से उत्पन्न सबकुछ, शून्य मे सब लीन है,
शून्य बिन सब तत्व कोरा और मतलब हीन है।
शून्य में मिल जाए लेकिन तो अखिल संसार है,
शून्य से कण-कण में गति, वर्ना जगत लाचार है।
सफ़र इस ब्रह्माण्ड का बस शून्य से है शून्य तक,
बीच में मिथ्या जगत का खेल होता है प्रकट,
खत्म इस माया-जगत का खेल कब हो जाएगा,
शून्य होगा शेष यह ब्रह्माण्ड थक सो जाएगा।
पर शून्य ही इस जगत का आधार है।
शून्य से ही श्रृष्टि की उत्पत्ति है,
शून्य ही ब्रह्माण्ड का विस्तार है।
शून्य से उत्पन्न सबकुछ, शून्य मे सब लीन है,
शून्य बिन सब तत्व कोरा और मतलब हीन है।
शून्य में मिल जाए लेकिन तो अखिल संसार है,
शून्य से कण-कण में गति, वर्ना जगत लाचार है।
सफ़र इस ब्रह्माण्ड का बस शून्य से है शून्य तक,
बीच में मिथ्या जगत का खेल होता है प्रकट,
खत्म इस माया-जगत का खेल कब हो जाएगा,
शून्य होगा शेष यह ब्रह्माण्ड थक सो जाएगा।
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