इंतज़ार में बैठोगे कब तक तुम उषा-उदय की।
लील जा रहीं जग को ज्वालायें पाखण्ड-प्रलय की।
मत सोचो ऐ मनुज! स्वर्ग से देव उतर आएंगे।
अमिय वृष्टि कर जग की सारी पीड़ा हर जाएंगे।
तज तंद्रा देखो कैसी ये जर्जर हुई मही है।
सोचो इस जर्जरता का कारण क्या मनुज नहीं है ?
पर्वत, नदियां वायुमंडल सब बीमार पड़े हैं।
नाश सामने है पर सब निष्क्रिय निश्चिंत खड़े हैं
खनन चोट से धरती नित घायल होती जाती है।
व्यथित देखती रहती जंगल जल की बर्बादी है।
शिखरों पर जो बर्फ मुकुट थे, वे भी क्षीण हुए हैं।
बादल, जंगल, जल, मिट्टी सारे गमगीन हुए हैं।
नदी कहे मैं थी निर्मल अब नाला बना दिया है।
घोल रसायन जल को मेरे तुमने जहर किया है।
कुदरत ने जो रत्न गढ़े, लाखों अरबों वर्षों में।
तुमने उन्हें खपत कर डाले कुछ दशकों वर्षों में
वात सिसकती है ओढ़े धूंऐं की काली चादर।
जननी प्रकृति झेल रही, पुरुषों का नित्य अनादर।
ऊपर से कुछ लोग बैठ दंभों की मीनारों पर।
दाग रहे विध्वंस अस्त्र दुनियां के बाजारों पर।
अगर बुद्धि का मानव की उपयोग यही होना है।
सर्वनाश निश्चित है, सबकी नियति मात्र रोना है।
निशा दूर है अब भी भू पर सर्वनाश है बाकी।
यदि अब भी जग कर तुम चिन्ता कर पाओ वसुधा की।
उठो, मनुज! झकझोरो, फिर से उदासीन निज मन को।
फिर से हरा भरा कर डालो अपने विश्व - चमन को।