Monday, July 9, 2018

जीवन की दुविधा





कहाँ खो गए हैं वो बचपन के सपने?
हुए अज़नबी कल जो होते थे अपने,
भरोसे की अट्टालिका ढह चुकी है।  
ये दुनियां बड़ी मतलबी बन चुकी है। 

तरंगों पे यह ज़िन्दगी तिर रही है।
किनारों से अब वास्ता कुछ नहीं है।
मशीन ही यहां हमसफर बन चुके हैं,
वफाओं से अब वास्ता कुछ नहीं है।

कभी ज़िन्दगी की जो मंज़िल बड़ी थी।
दीवार बन दूर में जो खड़ी थी।
जिसे लांघना लक्ष्य था ज़िन्दगी का।
मगर पार करना भी आसां नहीं था।

कभी मुड़ के जो देख लेता हूँ अक्सर।
नज़र मील का एक आता है पत्थर।
गिनता पड़ावों को ही जा रहा हूँ।
सुकूँ पर कहाँ राह में पा रहा हूँ?

मगर काल के वेग में चल रहा हूँ।
निर्रथक नए प्रश्न कर हल रहा हूँ।
धूमिल सभी लक्ष्य अब हो रहे हैं।
ये मंज़िल ,ये मकसद सभी खो रहे हैं।

कहूँ सच अगर, ऊबकर थक गया हूँ।
नए दौर में हो, "निरर्थक" गया हूँ।
"न मंज़िल न मकसद, सफर फिर ये क्यूँ है?
ये जीते ही जाने की क्यों आरज़ू है?"???
....
....
....
अभी मत कहो, "ऊबकर थक गया हूँ।
नए दौर में हो, 'निरर्थक' गया हूँ।"
पड़ाओं में जीना तो वो ज़िन्दगी है,
जो पतली गली में सिमट सी गयी है।

अभी शेष आयाम हैं ढेर सारे।
अभी शाम होने में है देर प्यारे।
अभी अनगिनत फूल खिलने हैं बाकी।
फ़िज़ा में कई रंग घुलने हैं बाकी।

अभी नूर में ताप है, तेज भी है।
अभी मकसदों की यहां क्या कमी है?
जरा अपने को खुद से बाहर निकालो।
क्षितिज तक ज़रा तुम निगाहें तो डालो !

अगर इनमे भी मिल न पाए प्रयोजन,
भला किसलिए हैं ये आध्यात्म-दर्शन??
उत्साह-घन जब घिरे मन गगन में।
कैसे भला फिर हो अवसाद मन में ??

Tuesday, April 10, 2018

एक प्रश्न


वतन में फैलती ही जा रही कैसी बिमारी है ?
कहीं दंगों से तन जख्मी, कहीं बेरोज़गारी है।

खजाने के खजाने लग गए सरकार के लेकिन ,
ज़मीनी जंग ग़ुरबत से यहाँ पर अब भी जारी है।

कहीं पर दिन दहाड़े आबरू लुटती है सड़कों पर ,
कहीं ईमानदारी पर फरेबी तंत्र भारी है।

धरम के नाम पर ही सैकड़ों मिटते -मिटाते हैं।
घृणा मन में पले  यह आस्था कैसी हमारी है ?

कई टुकड़ों में बंटकर लोग आपस में झगड़ते हैं ,
वतन पर चल रही कैसी ये नफरत की कटारी है ?

न हो तालीम से महरूम , ना  भूखा रहे कोई। 
नहीं क्या हिन्द के हर शख्श की ये ज़िम्मेदारी है ?


चतुर्दिक छ रहा ऐसा प्रदूषण का अज़ब मंजर ,
हुई दूषित हवा, बीमार नदियाँ , आज सारी  हैं।

ज़रा झकझोर लो मन को , ज़रा तन्द्रा से तुम उबरो ,
सम्हालो तुम उजड़ती जा रही बगिया जो प्यारी है। 

Friday, April 6, 2018

ब्यापारी की मनोब्यथा - एक हास्य कविता





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☺☺☺☺☺☺☺☺☺☺☺☺

(Written on the eve of GST coming into effect ...from the perspective of a worried businessperson)..As a piece of humour. 

Thursday, March 29, 2018

देवता और मानव



ऊपर बसते देव और मानव कराहता नीचे ,
कैसे ऊपर के वासी का भू पर ह्रदय पसीजे ?
सुनता हूँ वह स्वर्गच्छवि मिट्टी की नहीं बनी है ,
स्वर्ण रौप्य की धरा मोतियों - हीरों की जननी है।

देव जगत को शोभी करतीं वहां स्वर्ग की परियाँ  ,
सेवा में हाज़िर रहती हैं सौ सौ सुर-किन्नरियां ,
विराजते मणि - मुकुट सुसज्जित सुन्दर सिंहासन में ,
नृत्य अप्सराएं करतीं नित उनके स्वर्ग सदन में।

उन्हें कहाँ फुरसत चिंता करने की भू-मंडल की ?
क्लेश-द्वेष-परिपूर्ण , रुग्न , अति-दग्ध , ब्यथित भू-तल की।
त्राहि -त्राहि है मची हुई धरती तल के कण कण में ,
हो मदांध हैं विचर रहे , सुरगन निस्सीम गगन में।

देव! ज़रा देखो हालत खुद अपने धरा - निलय की ,
लील जा रहीं इनको ज्वालायें पाखण्ड प्रलय की।
कहो कौन से पाप नहीं होते तेरे मंदिर में ?
कितने लोग न लुट जाते नित तेरे पुण्य अजिर में।

सोम-सुरा में लिप्त, मस्त सुन ऐ वितंद्र अभिमानी !
भू-तल की रक्षा करने की भू-वासी ने ठानी।
सावधान!  देवता धरा पर शाशन करने वालो !
धरती की ज्वाला आ पहुँची , अपना स्वर्ग सम्हालो।

(* धरा -निलय - धरती पर देवताओं का घर अर्थात -मंदिर *)

** मेरे पूज्य पिताजी श्री सहदेव पोद्दार द्वारा लिखित मूल रचना का रूपांतरण। 

Tuesday, February 27, 2018

नयी होली


होलिका यहाँ हंस रही और
प्रह्लाद ज्वाल में तडप रहा।
सेंकडों हिरण्यकशिपुओं को
ढो रही अभी भी धरा यहाँ।
होली में होगी देर अभी
पहले करतब करना होगा।
दानवों, दस्युओं के कारण,
नरसिंह रूप धरना होगा।
जब चंद हिरण्यकशिपुओं का
आतंक न रहने पायेगा।
जब हर बालक का मन
बासंती फूलों सा लहरायेगा।
जब भ्रष्ट तंत्र के तारों की
होलिका जलायी जायेगी।
मानव जीवन के मूल्यों की,
पग-पग रक्षा की जायेगी।
जब हर नर में सच्चाई का
प्रह्लाद जन्म ले पायेगा,
छल -दंभ-क्रूरता का दानव,
जिसका न दमन कर पायैगा।
जब वर्ण वर्ण के चेहरे मिल
इक गुलदस्ता बन जायेंगे।
सौहार्द-स्नेह-करुणा का जल,
इक दूजे पर बरसायेंगे।
संपदा सुपूरित वसुधा में,
आनंद चतुर्दिक जब होगा।
जल, थल, अंबर सब झूमेंगे,
सच में तब रंगोत्सव होगा।
आनंद-पुष्प तब बरसेंगे
दुख क्लेष नहीं तन में होगा।
सब मिलकर खुशी मनायेंगे,
हां , द्वेष नहीं मन में होगा।
सच में एक दिन ऐसी होली
ऐसा नवीन युग आयेगा।
जब बिन गुलाल पिचकारी ही,
मन रंगों से भर जायेगा।
संजय:28-02-2018

Tuesday, February 13, 2018

बूढी हवेली का मर्म


रहे न रहनेवाले ही , कहाँ फिर गुफ्तगू होगी ?
मगर खाली मकानों की भी तो कुछ आरज़ू होगी ?

कई वर्षों से कोई अब हमारे दर नहीं आता।
उन्हें अपने ही बचपन का ये शायद घर नहीं भाता।

मगर मेरा अभी भी उन सभी से है वही नाता।
नहीं आने, न जाने से ये ताल्लुक मर नहीं जाता।

कभी यह घर ख़ुशी का , प्रेम का सुन्दर बगीचा था।
जिसे दादी  ने, माँ ने , स्नेह-जल से रोज़ सींचा था।

समय के वेग में  धूमिल हुए, बिखरे सभी मंज़र।
नियति की नीति में जाने छिपा था , कौन सा खंजर ?

नहीं आँगन में अब वो पायलों की गूँज बजती है।
नहीं दीवालियों में देहरी दुल्हन - सी सजती है।

रसोई से न अब पकवान की खुशबू महकती है।
वो सुन्दर कोठरी बे-नूर अब बेवा -सी दिखती है।

न ढेंकी -घर से कुछ कुटने की अब आवाज आती है।
न घर की नारियां , उत्साह से चक्की चलाती हैं।

कहाँ अब भगवती-घर में वो मंत्रोच्चार होता है ?
कहाँ अब पाठ -पूजा-सांझ-व्रत-ब्यवहार होता है ?

न तुलसी -पिंड में अब नित सुमन श्रद्धा के खिलते हैं ,
न प्रतिदिन सांझ के स्वागत में संध्या-दीप  जलते हैं।

गृहिणियां -बालिकाएं अब नहीं अठखेलियां करतीं ,
नहीं आँगन को, घर को , नित्यप्रति आनंद से भरतीं।

न दिखता बैठकी में बैठकों का दौर अब अक्सर ,
न बाबूजी का वो शासन, न ही काका के वो तेवर।

न जाने कब से है सूनी पड़ी , बैठक की वो चौकी ,
जहां ढाली गयी थी अनगिनत ही नीव सपनों की।

वो सावन में सभी का खेत जाकर बीज बो आना ,
वो अगहन में फसल को खेत से घर काट कर लाना।

पुआलों को बड़े ही यत्न  से छत पर सजा लेना।
ज़रुरत में कभी चारा , कभी ईंधन बना लेना.

वो "डमरू" और वह "जगदीश" अब घर पर नहीं आते?
फसल-खेतों की, बीजों की, कहाँ होती हैं अब बातें?

मवेशी अब कहाँ गोहाल की शोभा बढ़ाते हैं?
कहाँ गोधूलि में पगधूलि, अम्बर में उड़ाते हैं?

दशहरे में अखिल परिवार का एक साथ ही मिलना ,
सुमन आनंद-श्रद्धा-स्नेह का एक साथ ही खिलना।

सभी बातें हैं अब किस्से किसी गुजरे ज़माने के।
मगर अनमोल हीरे हैं वे स्मृतियों के खजाने के।

वो आँगन -देहरी प्रतिदिन किसी की राह तकती हैं ,
रसोई - कोठरी यादों में अपनों की  सिसकती हैं।

समय की मार से बीमार जर्जर हो रहा हूँ मैं,
डिगे रहने की हिम्मत और ताकत खो रहा हूँ मैं।

अकेला मैं यहाँ सूनी गली से बात करता हूँ ,
दुआ सबकी कुशलता की मगर दिन रात करता हूँ।

पुराने पेड़ ही अब कुछ बचे साथी यहां मेरे।
अतिथि बन रोज़ आते हैं कबूतर -वृन्द बहुतेरे।

कभी गर याद आऊं , मुझसे मिलने तुम चले आना।
धरोहर हूँ तुम्हारे पूर्वजों की तुम न सकुचाना।

(संजय : १३-०२-२०१८)


Saturday, January 13, 2018

वेदना और सृजन


अंतरतम की पीड़ाएँ जब अश्रु बूँद बन झरती हैं ,
मनोवेदना रागिनियों का लेकर रूप घुमड़ती हैं। 
कष्ट ह्रदय का रागिनियों की धारा में घुल जाता है। 
बोझिल अंतरतम का तब फिर द्वार स्वतः खुल जाता है। 

मनोवेदना निकल जेहन से दूर कहीं खो जाती है। 
हर्ष, प्रेम , उत्साह -पुंज के बीज नए बो जाती है। 
पंख चेतना के फैलाकर मन चहुँ-ओर विहरता तब। 
चुग आता भावों के कण नित और सृजन कुछ करता नव।