Tuesday, February 27, 2018

नयी होली


होलिका यहाँ हंस रही और
प्रह्लाद ज्वाल में तडप रहा।
सेंकडों हिरण्यकशिपुओं को
ढो रही अभी भी धरा यहाँ।
होली में होगी देर अभी
पहले करतब करना होगा।
दानवों, दस्युओं के कारण,
नरसिंह रूप धरना होगा।
जब चंद हिरण्यकशिपुओं का
आतंक न रहने पायेगा।
जब हर बालक का मन
बासंती फूलों सा लहरायेगा।
जब भ्रष्ट तंत्र के तारों की
होलिका जलायी जायेगी।
मानव जीवन के मूल्यों की,
पग-पग रक्षा की जायेगी।
जब हर नर में सच्चाई का
प्रह्लाद जन्म ले पायेगा,
छल -दंभ-क्रूरता का दानव,
जिसका न दमन कर पायैगा।
जब वर्ण वर्ण के चेहरे मिल
इक गुलदस्ता बन जायेंगे।
सौहार्द-स्नेह-करुणा का जल,
इक दूजे पर बरसायेंगे।
संपदा सुपूरित वसुधा में,
आनंद चतुर्दिक जब होगा।
जल, थल, अंबर सब झूमेंगे,
सच में तब रंगोत्सव होगा।
आनंद-पुष्प तब बरसेंगे
दुख क्लेष नहीं तन में होगा।
सब मिलकर खुशी मनायेंगे,
हां , द्वेष नहीं मन में होगा।
सच में एक दिन ऐसी होली
ऐसा नवीन युग आयेगा।
जब बिन गुलाल पिचकारी ही,
मन रंगों से भर जायेगा।
संजय:28-02-2018

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