Monday, December 18, 2017

इंसान की बेबसी

कैसे बताऊँ, जी रहा इनसान है किस हाल में।
पल पल उलझता जा रहा क्या जीत में , क्या हार में ।

विश्वास की अट्टालिका है ध्वस्त कब की हो चुकी।
संदेह करता फिर रहा, हर शख्श कारोबार में।

परिमित जगत में मानवों की हैं अपरिमित ख्वाहिशें।
संग्राम पल पल ठन रहा, अस्थिर-ब्यथित संसार में।

जीवन के मुश्किल ब्यूह में सब इस कदर हैं जूझते।
जैसे कि सागर बीच ह़ो नौका पडी मझधार में।

लालच की देखो इंतहा, खुद लूटकर अपना ही घर।
चैनो सुकून पाने को अब निकले हैं वे बाजार में।

पर्यावरण की अस्मिता है भंग कुछ ऐसी हुई।
अब "विष रहित" कुछ भी नहीं इस विश्व के विस्तार में।

मत सोच मानव ! देव धरती पर उतर फिर आयेंगे।
कर वृष्टि अमृत की तुम्हारा कष्ट सब हर जायेंगे।

पर निशा है दूर अब भी हो सके तो चेत लो।
बंद कर विध्वंस की लीला सुभग पथ पर चलो।

Thursday, October 19, 2017

दिवाली - कुछ मुक्तक :



१.
दिए देहरी पर जलाना यकीनन ,
खिला देना तुम रोशनी की बहारें।
मगर देखना रह न बे -नूर जाए ,
कोई दिल का कोना, कोई मन का कोना।

२.
दीयों को फक्र था जलती हुई अपनी लौ पर ,
अँधेरे चीर कर जो रोशनी लुटाते थे।
मगर विद्युत् -जनित इस रोशनी के मेले में।
बुझे बुझे से ये जलते दिए भी दीखते हैं।
जलाता कौन है अब इनको तम मिटाने को ,
ये तो जलते हैं देहरी पे बस जलने के लिए।

३.
जब घोर निराशा की बदरी,
निज ह्रदयाम्बर पर छाई हो।
घनघोर अमावस की रजनी
जब वसुधा पर घिर आई हो।
ऐसे में कोई दीप जले,
अंतरमन हो जाये पुलकित।
जल उठे दिब्य इक 'ज्योति-पुंज',
वसुधा का कण कण हो दीपित।
उल्लास, प्रेम, आनंद, खुशी,
का मौसम धरती पर छाये।
जग में न छल कपट और द्वेष का
लेष मात्र रहने पाये।
संपदा सुपूरित वसुधा में
सर्वत्र सदा हरियाली हो।
हर घर में खुशी का दीप जले,
ऐसी ही हर दीवाली हो।

इस बार दिवाली कैसी हो ?



वर्षों -दशकों, जिन देहरियों पर
अंधकार ही छाया हो।
इस चकाचौंध की दुनिया में भी,
जो जीवन मुरझाया हो।
ऐसे उजडे उपवन में क्यूँ ना,
कोई फूल खिला आऐं?
कुछ दीप अंधेरी गलियों में भी,
आओ, आज जला आएं।

इस बार दिवाली ऐसी हो।

एक तरफ यहाँ पर दुनिया में,
है दौलत का अंबार खडा।
उस तरफ वेदना ग्रसित भीड से,
बोझिल हो रो रही धरा।
ये क्रूर विषमता मिट जाऐ,
धरती जन्नत सी लग पाये,
कुछ भाव, त्याग-अपनेपन की,
हर दिल में चलो जगा आयें।

इस बार दिवाली ऐसी हो।
घर खूब सजाना तन मन से।
रौशनी-रंग से भर देना,
वसुधा पर  सुंदर बनी रहे,
विस्मृत न इसे तुम कर देना।
"अब और नहीं, दूषित होगी,
धरती माता" ये प्रण गायें।
हम इसी भाव का दीप एक
हर दिल में चलो जला आऐं।

इस बार दिवाली ऐसी हो।

कलियुग में रावण और नहीं
"बस लालच, द्वेष, प्रदूषण है।"
छल , कपट ,क्रूरता रूप लिए ,
पथ पथ करता वह विचरण है। 
रे मनुज अवतरण यहाँ राम का,
बार बार ही क्या होगा?
'अब के रावण'  के हम्ही जनक,
राम भी हमें बनना होगा।

इस बार दिवाली ऐसी हो।

Monday, July 17, 2017

मजदूरनी




मयूराक्षी की तटी से सटी  है
तलहटी हिजला पहाड़ी की।

तलहटी से तनिक ऊपर ,
एक निर्जन शांत पर ,
पत्थरों को तोड़ने में ,
भाग्य फूटे जोड़ने में ,
ब्यस्त थी एक अकेली
मजदूरनी दिनभर  निरन्तर।

बगल में कुछ दूर हटकर
पत्थरों की शायिका पर ,
कालक्रम से ग्रसित शिशु मजदूरनी का,
भाग्य से अनभिग्य  बेसुध सो रहा था।

तभी सहसा हथौड़े की चोट पाकर ,
एक पत्थर ज़ोर से उछला छिटककर ,
लगा शिशु के फूल से कोमल बदन पर ,
लगी बहने रक्त की धारा निरंतर।

गोद में सु त को उठाकर ,
चक्षुओं में अश्रु भर ,
लाचार वो मजदूरनी ,
रोने लगी सु त संग बिलखकर। 

कभी खुद को कोसती ,
फिर कभी विधि से पूछती ,
"जो पा रही वह आज है,
किस जन्म का अभिशाप है ?"

"क्यों आज मेरा श्रम बना है
 शत्रु मेरे स्नेह का?
क्यों छा रहा है मेघ ऊपर ,
अपरिमित दुःख क्लेश का?"

पर यहां उसके सवालों
का भला दे कौन उत्तर?
हो चुकी दुनियां अखिल
उसके लिए है आज पत्थर।

सत्य ही ये बात कुछ
ऋषि -ज्ञानियों  ने है कही।
बदनसीबों के लिए
संसार में कुछ भी नहीं।

गर्त्त भी दुःख क्लेश का
पर्याप्त है गहरा नहीं।
वक्त भी परवाह उनकी ,
कर कभी ठहरा नहीं।


Tuesday, July 4, 2017

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

ज़रा सी कहीं क्या हुई सुगबुगाहट,
लगे ढूंढने उसमे नीयत किसी की।
उधर मेघ गरजा या तूफ़ां क्या आया ,
नज़र आयी इसमें भी साजिश किसी की।
नेकी में भी कुछ बदी ढूंढ लाकर ,
शरारत  ही बस हर जगह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

माना ज़माना नहीं नेक लेकिन ,
मगर नेक कब सारी  दुनियां रही है?
कहाँ तय था सब मन मुताबिक ही होगा?
जो  दस्तूर कल था वो अब भी वही है।
मगर फूल के बीच कांटे दिखाकर ,
शिकायत ही बस हर जगह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

वतन के लिए गोलियां जिसने खायी ,
वतन के लिए जिसने जान तक गवाई ,
न हिन्दू थे, मुस्लिम थे , न वे ईसाई ,
सभी वीर थे हिन्द के बस सिपाही।
शहादत को भी मज़हबी रंग देकर ,
सियासत  ही क्यों हर जगह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह  ढूंढते हो?

विषमता नियम है, अगर देख पाओ ,
कहीं पर शिखर तो कहीं घाटियां हैं।
कहीं पर मरुस्थल की फ़ैली है चादर ,
रंगी कहीं पर बिछी वादियां हैं।
नतीजा-ए -साजिश इन्हे भी बताकर ,
कलह की वजह हर जगह ढूंढते हो।

क्यों बे-वजह तुम वजह ढूंढते हो?






Monday, July 3, 2017

चाँद की ब्यथा




ग़ालिब ने कहा, क्या खूब कहा,
एक आफताब ही काफी था ,
फिर चाँद फलक पर क्यों उतरा ,
अपना तेवर दिखलाने को ?

दिन भर की तपिश मिटाने को ,
पलकें क्या बंद करी हमने ,
वो आ धमका बन बहरूपिया ,
रातों को हमें चिढ़ाने को।

इतनी क्या समझ नहीं तुझको,
रातों को भूत भटकते हैं ?
किनको दिनमणि संग चैन नहीं ,
वे ही रातों को जागते हैं?

पर शायद पूर्व जनम में धरती
से तेरा कुछ नाता था ,
इस कारण सब धरती वासी,
तेरे कुछ न कुछ लगते हैं।

क्यों भटक रहे हो  एकाकी,
तुम युगों-युगों नीरव नभ में ?
चांदी  सी सुन्दर शक्ल लिए,
दिखते लेकिन केवल "शब् " में?

पर क्या ये सब तुम सदियों से ,
बे-अर्थ ही किये जाते हो?
या इसमें कोई राज छिपा,
जिसको न हमें बतलाते हो?

"रे मनुज!,सुनो, अब और नहीं
अपमान में जलने पाऊंगा।
दिन रात तुम्हारे ब्यँग्यवाण  सह ,
और न चलने पाऊंगा।

"चांदी सी शक्ल नहीं मेरी ,
यह दग्ध ब्यथित मेरा तन है।
दिन रात तपिश सहते रहना
ही हुआ आज यह जीवन है।

"जब पुरखे भी तेरे धरती पर ,
पाँव नहीं रख पाए थे।
जब नहीं किसी कोने में भी ,
जीवन के बीज समाये थे। "

"तब से ही हूँ मैं विचार रहा,
अम्बर पथ पर अविचल अविरल।
वसुधा से दूर न जा भटकूं ,
बस चाह रही इतनी केवल।

"सूरज के तेज थपेड़ों को ,
झेला है मैंने सदियों से।
मैं रहा सदा इतने वर्षों,
महरूम जंगलों -नदियों से "

"सैंकड़ों , हज़ारों चट्टानों की ,
चोटें भी मैंने खायीं।
हैं जख्म बयां करते मेरे ,
पर्वत क्रेटर की गहराई। "

"इन जख्मों को ही तुम मेरे,
चेहरे का दाग समझते हो।
शशि से चेहरे की उपमा को
जीवन का भाग समझते हो। "

"तुम तो धरती के आँचल में ,
जीवन आनंद उठाते हो।
पर निष्ठुर हो मेरी दुर्गति
में कौतुहल बस पाते हो। "

"ऐ मनुज! कल्पना में तेरी ,
अब और न सजने पाऊंगा।
तेरे विनोद और कौतुहल का
पात्र न बनने पाऊंगा। "





Sunday, July 2, 2017

इतिहास की नियति



मैं उठा लाया कहीं से वाकयों के चंद टुकड़े ,
वही जो कुछ समय के सोपान पर बिखरे पड़े थे।

पिरोकर फिर कल्पना की चाशनी में मन -मुताबिक़ ,
मैं लगा इनसे कोई रोचक मनोहर चित्र गढ़ने। 

चंद टुकड़ों से भला बनती है कब तस्वीर पूरी ,
कब खिंचा है चित्र कुछ विकृत लकीरों से अधूरी?

किन्तु मनु की कल्पना की धार में ऐसा असर है ,
पिघल उठता वज़्र , हो जाता सरल दुर्गम सफर है। 

बस इसी विश्वास से , मानस -तरणि आसीन हो मैं ,
कुछ लगा यूँ वाकयों के बिंदुओं से खेल करने।

बांधकर  इनको परस्पर कल्पना के सूत्र में इक ,
रच सके कोई कहानी यूँ लगा कुछ मेल करने। 

शीघ्र बन आया कोई आकार अद्भुत सा निराला,
मुदित हो कर कहा खुद से , क्या गज़ब कर काम डाला।

"यही वह तस्वीर है जो राज सब कुछ खोलती है,
परिधि से बाहर निकलकर , स्वतः सबकुछ बोलती है। "

" सामने है, आज अब इतिहास की पूरी हकीकत ,
दफ्न जो पहले कभी थी वक्त की परतों के अंदर। "

कल्पना ही कहानी  हर दौर के इतिहास की है,
तुम बुरा मानो, भला मानो, मगर सच तो यही है।