Monday, July 17, 2017

मजदूरनी




मयूराक्षी की तटी से सटी  है
तलहटी हिजला पहाड़ी की।

तलहटी से तनिक ऊपर ,
एक निर्जन शांत पर ,
पत्थरों को तोड़ने में ,
भाग्य फूटे जोड़ने में ,
ब्यस्त थी एक अकेली
मजदूरनी दिनभर  निरन्तर।

बगल में कुछ दूर हटकर
पत्थरों की शायिका पर ,
कालक्रम से ग्रसित शिशु मजदूरनी का,
भाग्य से अनभिग्य  बेसुध सो रहा था।

तभी सहसा हथौड़े की चोट पाकर ,
एक पत्थर ज़ोर से उछला छिटककर ,
लगा शिशु के फूल से कोमल बदन पर ,
लगी बहने रक्त की धारा निरंतर।

गोद में सु त को उठाकर ,
चक्षुओं में अश्रु भर ,
लाचार वो मजदूरनी ,
रोने लगी सु त संग बिलखकर। 

कभी खुद को कोसती ,
फिर कभी विधि से पूछती ,
"जो पा रही वह आज है,
किस जन्म का अभिशाप है ?"

"क्यों आज मेरा श्रम बना है
 शत्रु मेरे स्नेह का?
क्यों छा रहा है मेघ ऊपर ,
अपरिमित दुःख क्लेश का?"

पर यहां उसके सवालों
का भला दे कौन उत्तर?
हो चुकी दुनियां अखिल
उसके लिए है आज पत्थर।

सत्य ही ये बात कुछ
ऋषि -ज्ञानियों  ने है कही।
बदनसीबों के लिए
संसार में कुछ भी नहीं।

गर्त्त भी दुःख क्लेश का
पर्याप्त है गहरा नहीं।
वक्त भी परवाह उनकी ,
कर कभी ठहरा नहीं।


Tuesday, July 4, 2017

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

ज़रा सी कहीं क्या हुई सुगबुगाहट,
लगे ढूंढने उसमे नीयत किसी की।
उधर मेघ गरजा या तूफ़ां क्या आया ,
नज़र आयी इसमें भी साजिश किसी की।
नेकी में भी कुछ बदी ढूंढ लाकर ,
शरारत  ही बस हर जगह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

माना ज़माना नहीं नेक लेकिन ,
मगर नेक कब सारी  दुनियां रही है?
कहाँ तय था सब मन मुताबिक ही होगा?
जो  दस्तूर कल था वो अब भी वही है।
मगर फूल के बीच कांटे दिखाकर ,
शिकायत ही बस हर जगह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

वतन के लिए गोलियां जिसने खायी ,
वतन के लिए जिसने जान तक गवाई ,
न हिन्दू थे, मुस्लिम थे , न वे ईसाई ,
सभी वीर थे हिन्द के बस सिपाही।
शहादत को भी मज़हबी रंग देकर ,
सियासत  ही क्यों हर जगह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह  ढूंढते हो?

विषमता नियम है, अगर देख पाओ ,
कहीं पर शिखर तो कहीं घाटियां हैं।
कहीं पर मरुस्थल की फ़ैली है चादर ,
रंगी कहीं पर बिछी वादियां हैं।
नतीजा-ए -साजिश इन्हे भी बताकर ,
कलह की वजह हर जगह ढूंढते हो।

क्यों बे-वजह तुम वजह ढूंढते हो?






Monday, July 3, 2017

चाँद की ब्यथा




ग़ालिब ने कहा, क्या खूब कहा,
एक आफताब ही काफी था ,
फिर चाँद फलक पर क्यों उतरा ,
अपना तेवर दिखलाने को ?

दिन भर की तपिश मिटाने को ,
पलकें क्या बंद करी हमने ,
वो आ धमका बन बहरूपिया ,
रातों को हमें चिढ़ाने को।

इतनी क्या समझ नहीं तुझको,
रातों को भूत भटकते हैं ?
किनको दिनमणि संग चैन नहीं ,
वे ही रातों को जागते हैं?

पर शायद पूर्व जनम में धरती
से तेरा कुछ नाता था ,
इस कारण सब धरती वासी,
तेरे कुछ न कुछ लगते हैं।

क्यों भटक रहे हो  एकाकी,
तुम युगों-युगों नीरव नभ में ?
चांदी  सी सुन्दर शक्ल लिए,
दिखते लेकिन केवल "शब् " में?

पर क्या ये सब तुम सदियों से ,
बे-अर्थ ही किये जाते हो?
या इसमें कोई राज छिपा,
जिसको न हमें बतलाते हो?

"रे मनुज!,सुनो, अब और नहीं
अपमान में जलने पाऊंगा।
दिन रात तुम्हारे ब्यँग्यवाण  सह ,
और न चलने पाऊंगा।

"चांदी सी शक्ल नहीं मेरी ,
यह दग्ध ब्यथित मेरा तन है।
दिन रात तपिश सहते रहना
ही हुआ आज यह जीवन है।

"जब पुरखे भी तेरे धरती पर ,
पाँव नहीं रख पाए थे।
जब नहीं किसी कोने में भी ,
जीवन के बीज समाये थे। "

"तब से ही हूँ मैं विचार रहा,
अम्बर पथ पर अविचल अविरल।
वसुधा से दूर न जा भटकूं ,
बस चाह रही इतनी केवल।

"सूरज के तेज थपेड़ों को ,
झेला है मैंने सदियों से।
मैं रहा सदा इतने वर्षों,
महरूम जंगलों -नदियों से "

"सैंकड़ों , हज़ारों चट्टानों की ,
चोटें भी मैंने खायीं।
हैं जख्म बयां करते मेरे ,
पर्वत क्रेटर की गहराई। "

"इन जख्मों को ही तुम मेरे,
चेहरे का दाग समझते हो।
शशि से चेहरे की उपमा को
जीवन का भाग समझते हो। "

"तुम तो धरती के आँचल में ,
जीवन आनंद उठाते हो।
पर निष्ठुर हो मेरी दुर्गति
में कौतुहल बस पाते हो। "

"ऐ मनुज! कल्पना में तेरी ,
अब और न सजने पाऊंगा।
तेरे विनोद और कौतुहल का
पात्र न बनने पाऊंगा। "





Sunday, July 2, 2017

इतिहास की नियति



मैं उठा लाया कहीं से वाकयों के चंद टुकड़े ,
वही जो कुछ समय के सोपान पर बिखरे पड़े थे।

पिरोकर फिर कल्पना की चाशनी में मन -मुताबिक़ ,
मैं लगा इनसे कोई रोचक मनोहर चित्र गढ़ने। 

चंद टुकड़ों से भला बनती है कब तस्वीर पूरी ,
कब खिंचा है चित्र कुछ विकृत लकीरों से अधूरी?

किन्तु मनु की कल्पना की धार में ऐसा असर है ,
पिघल उठता वज़्र , हो जाता सरल दुर्गम सफर है। 

बस इसी विश्वास से , मानस -तरणि आसीन हो मैं ,
कुछ लगा यूँ वाकयों के बिंदुओं से खेल करने।

बांधकर  इनको परस्पर कल्पना के सूत्र में इक ,
रच सके कोई कहानी यूँ लगा कुछ मेल करने। 

शीघ्र बन आया कोई आकार अद्भुत सा निराला,
मुदित हो कर कहा खुद से , क्या गज़ब कर काम डाला।

"यही वह तस्वीर है जो राज सब कुछ खोलती है,
परिधि से बाहर निकलकर , स्वतः सबकुछ बोलती है। "

" सामने है, आज अब इतिहास की पूरी हकीकत ,
दफ्न जो पहले कभी थी वक्त की परतों के अंदर। "

कल्पना ही कहानी  हर दौर के इतिहास की है,
तुम बुरा मानो, भला मानो, मगर सच तो यही है।