मैं उठा लाया कहीं से वाकयों के चंद टुकड़े ,
वही जो कुछ समय के सोपान पर बिखरे पड़े थे।
पिरोकर फिर कल्पना की चाशनी में मन -मुताबिक़ ,
मैं लगा इनसे कोई रोचक मनोहर चित्र गढ़ने।
चंद टुकड़ों से भला बनती है कब तस्वीर पूरी ,
कब खिंचा है चित्र कुछ विकृत लकीरों से अधूरी?
किन्तु मनु की कल्पना की धार में ऐसा असर है ,
पिघल उठता वज़्र , हो जाता सरल दुर्गम सफर है।
बस इसी विश्वास से , मानस -तरणि आसीन हो मैं ,
कुछ लगा यूँ वाकयों के बिंदुओं से खेल करने।
बांधकर इनको परस्पर कल्पना के सूत्र में इक ,
रच सके कोई कहानी यूँ लगा कुछ मेल करने।
शीघ्र बन आया कोई आकार अद्भुत सा निराला,
मुदित हो कर कहा खुद से , क्या गज़ब कर काम डाला।
"यही वह तस्वीर है जो राज सब कुछ खोलती है,
परिधि से बाहर निकलकर , स्वतः सबकुछ बोलती है। "
" सामने है, आज अब इतिहास की पूरी हकीकत ,
दफ्न जो पहले कभी थी वक्त की परतों के अंदर। "
कल्पना ही कहानी हर दौर के इतिहास की है,
तुम बुरा मानो, भला मानो, मगर सच तो यही है।
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