Wednesday, September 8, 2021

विघ्न और संकल्प

 विघ्न और संकल्प 


विपदागिरि ने पथ में बाधाएं असंख्य पहुँचाईं।
किंतु अथक जलधार सदृश आपने मात कब खाई?


तिनकों का संबल लेकर, दृढ़ प्रण का लिये सहारा।
मंज़िल को चल दिये अनवरत, ज्यों सरिता की धारा।


भय आशंका, असुरक्षा के घन मन मे मंडराते।
उम्मीदों की डोर थाम पर आगे बढ़ते जाते।


ब्याधों ने ललकारा,ब्यालों ने राहों में रोका।
कठिन मार्ग है, कुछ अपनो ने भी समझाया, टोका।


दृढ़प्रतिज्ञ मानव स्थितियों के आगे कब झुकते हैं?
कहाँ राह में भय खाकर वे थकते हैं, रुकते हैं?


पथ हो दुर्गम , और कोई जब साथ नहीं देता है।
कहते हैं ऐसे ही में संकल्प जन्म लेता है।


धनाभाव, बैरी समाज सब पीछे रह जाते हैं।
पथ के पत्थर गंतब्यों की सीढ़ी बन जाते हैं।

महामारी और मानवता



हे महाकाल ! धरती पर कैसा, प्रलय-मेघ यह घिर आया?
चहुंओर महामारी फैली, कैसा मंजर भू पर छाया?
सब लोग बिलखते जाते हैं, जीवन‌ की अंतिम आशा में।
लाखों परिवार यहां डूबे हैं,विपदा और निराशा में।
ऐसे में भी कुछ लोग यहां, "नरगिद्ध" बने मंडराते हैं।
आपदाग्रसित को नोच-नोच ,"लालच की भूख" मिटाते हैं।
रोदन-क्रंदन-बेबसी चतुर्दिक, हाहाकार असीम अनंत।
जाने किस विधि हो पाये इस प्रलय-अग्नि का यहां अंत।
ऐ देव‌! जहां भी हो, धरती पर एक नजर तो डालो तुम।
असहाय धरावासी को तो संकट से आज बचा लो तुम।
कुछ और नहीं तो, इस जग पर तुम कृपा देव इतनी कर दो।
मृत "मानवता" को जीवित कर ,जन-जन में तुम वापस भर दो।
भ्रातृत्व, प्रेम, करुणा एक दूजे पर हर मानव दिखलाये।
छल-कपट-द्वेष-निष्ठुरता मन में तनिक नहीं रहने पाये।
फिर कोरोना क्या, और बडे संकट को भी सह लेंगे हम।
मानवता यदि बच पायी तो, कष्टों में भी रह लेंगे हम।।