हे महाकाल ! धरती पर कैसा, प्रलय-मेघ यह घिर आया?
चहुंओर महामारी फैली, कैसा मंजर भू पर छाया?
सब लोग बिलखते जाते हैं, जीवन की अंतिम आशा में।
लाखों परिवार यहां डूबे हैं,विपदा और निराशा में।
ऐसे में भी कुछ लोग यहां, "नरगिद्ध" बने मंडराते हैं।
आपदाग्रसित को नोच-नोच ,"लालच की भूख" मिटाते हैं।
रोदन-क्रंदन-बेबसी चतुर्दिक, हाहाकार असीम अनंत।
जाने किस विधि हो पाये इस प्रलय-अग्नि का यहां अंत।
ऐ देव! जहां भी हो, धरती पर एक नजर तो डालो तुम।
असहाय धरावासी को तो संकट से आज बचा लो तुम।
कुछ और नहीं तो, इस जग पर तुम कृपा देव इतनी कर दो।
मृत "मानवता" को जीवित कर ,जन-जन में तुम वापस भर दो।
भ्रातृत्व, प्रेम, करुणा एक दूजे पर हर मानव दिखलाये।
छल-कपट-द्वेष-निष्ठुरता मन में तनिक नहीं रहने पाये।
फिर कोरोना क्या, और बडे संकट को भी सह लेंगे हम।
मानवता यदि बच पायी तो, कष्टों में भी रह लेंगे हम।।
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