विघ्न और संकल्प
विपदागिरि ने पथ में बाधाएं असंख्य पहुँचाईं।
किंतु अथक जलधार सदृश आपने मात कब खाई?
तिनकों का संबल लेकर, दृढ़ प्रण का लिये सहारा।
मंज़िल को चल दिये अनवरत, ज्यों सरिता की धारा।
भय आशंका, असुरक्षा के घन मन मे मंडराते।
उम्मीदों की डोर थाम पर आगे बढ़ते जाते।
ब्याधों ने ललकारा,ब्यालों ने राहों में रोका।
कठिन मार्ग है, कुछ अपनो ने भी समझाया, टोका।
दृढ़प्रतिज्ञ मानव स्थितियों के आगे कब झुकते हैं?
कहाँ राह में भय खाकर वे थकते हैं, रुकते हैं?
पथ हो दुर्गम , और कोई जब साथ नहीं देता है।
कहते हैं ऐसे ही में संकल्प जन्म लेता है।
धनाभाव, बैरी समाज सब पीछे रह जाते हैं।
पथ के पत्थर गंतब्यों की सीढ़ी बन जाते हैं।
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