ऊपर बसते देव और मानव कराहता नीचे ,
कैसे ऊपर के वासी का भू पर ह्रदय पसीजे ?
सुनता हूँ वह स्वर्गच्छवि मिट्टी की नहीं बनी है ,
स्वर्ण रौप्य की धरा मोतियों - हीरों की जननी है।
देव जगत को शोभी करतीं वहां स्वर्ग की परियाँ ,
सेवा में हाज़िर रहती हैं सौ सौ सुर-किन्नरियां ,
विराजते मणि - मुकुट सुसज्जित सुन्दर सिंहासन में ,
नृत्य अप्सराएं करतीं नित उनके स्वर्ग सदन में।
उन्हें कहाँ फुरसत चिंता करने की भू-मंडल की ?
क्लेश-द्वेष-परिपूर्ण , रुग्न , अति-दग्ध , ब्यथित भू-तल की।
त्राहि -त्राहि है मची हुई धरती तल के कण कण में ,
हो मदांध हैं विचर रहे , सुरगन निस्सीम गगन में।
देव! ज़रा देखो हालत खुद अपने धरा - निलय की ,
लील जा रहीं इनको ज्वालायें पाखण्ड प्रलय की।
कहो कौन से पाप नहीं होते तेरे मंदिर में ?
कितने लोग न लुट जाते नित तेरे पुण्य अजिर में।
सोम-सुरा में लिप्त, मस्त सुन ऐ वितंद्र अभिमानी !
भू-तल की रक्षा करने की भू-वासी ने ठानी।
सावधान! देवता धरा पर शाशन करने वालो !
धरती की ज्वाला आ पहुँची , अपना स्वर्ग सम्हालो।
(* धरा -निलय - धरती पर देवताओं का घर अर्थात -मंदिर *)
** मेरे पूज्य पिताजी श्री सहदेव पोद्दार द्वारा लिखित मूल रचना का रूपांतरण।