कहाँ खो गए हैं वो बचपन के सपने?
हुए अज़नबी कल जो होते थे अपने,
भरोसे की अट्टालिका ढह चुकी है।
ये दुनियां बड़ी मतलबी बन चुकी है।
तरंगों पे यह ज़िन्दगी तिर रही है।
किनारों से अब वास्ता कुछ नहीं है।
मशीन ही यहां हमसफर बन चुके हैं,
वफाओं से अब वास्ता कुछ नहीं है।
किनारों से अब वास्ता कुछ नहीं है।
मशीन ही यहां हमसफर बन चुके हैं,
वफाओं से अब वास्ता कुछ नहीं है।
कभी ज़िन्दगी की जो मंज़िल बड़ी थी।
दीवार बन दूर में जो खड़ी थी।
जिसे लांघना लक्ष्य था ज़िन्दगी का।
मगर पार करना भी आसां नहीं था।
दीवार बन दूर में जो खड़ी थी।
जिसे लांघना लक्ष्य था ज़िन्दगी का।
मगर पार करना भी आसां नहीं था।
कभी मुड़ के जो देख लेता हूँ अक्सर।
नज़र मील का एक आता है पत्थर।
गिनता पड़ावों को ही जा रहा हूँ।
सुकूँ पर कहाँ राह में पा रहा हूँ?
नज़र मील का एक आता है पत्थर।
गिनता पड़ावों को ही जा रहा हूँ।
सुकूँ पर कहाँ राह में पा रहा हूँ?
मगर काल के वेग में चल रहा हूँ।
निर्रथक नए प्रश्न कर हल रहा हूँ।
धूमिल सभी लक्ष्य अब हो रहे हैं।
ये मंज़िल ,ये मकसद सभी खो रहे हैं।
निर्रथक नए प्रश्न कर हल रहा हूँ।
धूमिल सभी लक्ष्य अब हो रहे हैं।
ये मंज़िल ,ये मकसद सभी खो रहे हैं।
कहूँ सच अगर, ऊबकर थक गया हूँ।
नए दौर में हो, "निरर्थक" गया हूँ।
"न मंज़िल न मकसद, सफर फिर ये क्यूँ है?
ये जीते ही जाने की क्यों आरज़ू है?"???
....
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नए दौर में हो, "निरर्थक" गया हूँ।
"न मंज़िल न मकसद, सफर फिर ये क्यूँ है?
ये जीते ही जाने की क्यों आरज़ू है?"???
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अभी मत कहो, "ऊबकर थक गया हूँ।
नए दौर में हो, 'निरर्थक' गया हूँ।"
पड़ाओं में जीना तो वो ज़िन्दगी है,
जो पतली गली में सिमट सी गयी है।
नए दौर में हो, 'निरर्थक' गया हूँ।"
पड़ाओं में जीना तो वो ज़िन्दगी है,
जो पतली गली में सिमट सी गयी है।
अभी शेष आयाम हैं ढेर सारे।
अभी शाम होने में है देर प्यारे।
अभी अनगिनत फूल खिलने हैं बाकी।
फ़िज़ा में कई रंग घुलने हैं बाकी।
अभी शाम होने में है देर प्यारे।
अभी अनगिनत फूल खिलने हैं बाकी।
फ़िज़ा में कई रंग घुलने हैं बाकी।
अभी नूर में ताप है, तेज भी है।
अभी मकसदों की यहां क्या कमी है?
जरा अपने को खुद से बाहर निकालो।
क्षितिज तक ज़रा तुम निगाहें तो डालो !
अभी मकसदों की यहां क्या कमी है?
जरा अपने को खुद से बाहर निकालो।
क्षितिज तक ज़रा तुम निगाहें तो डालो !
अगर इनमे भी मिल न पाए प्रयोजन,
भला किसलिए हैं ये आध्यात्म-दर्शन??
उत्साह-घन जब घिरे मन गगन में।
कैसे भला फिर हो अवसाद मन में ??
भला किसलिए हैं ये आध्यात्म-दर्शन??
उत्साह-घन जब घिरे मन गगन में।
कैसे भला फिर हो अवसाद मन में ??