Thursday, August 18, 2022
कुछ बाकी है
संताप और सृजन
क्या लिखूं?
कुछ सावन की बरसात लिखो। कुछ बचपन की सौगात लिखो।
कुछ स्कूल -दिनों की याद लिखो। कुछ विघ्न और ब्याघात लिखो।
Wednesday, August 17, 2022
आकांक्षा और आशंका
कुछ पा लेने की ललक हुई,
कुछ गन्तब्यों ने ललचाया।
पग आगे बढ़ने लगा किन्हीं ,
अनजान अनिश्चित राहों पर।
राहों ने बँटकर प्रश्न किया ,
आगे किस पथ पर जाओगे?
फिर ब्यंग्य कसा , जाओ जिस पथ
एकाकी खुद को पाओगे।
मन की दुनियां में भावों का
सागर अविरल लहराता है,
कर चेतनता को भ्रमित जाल
उलझन का नया बिछाता है।
रोड़े भी हैं , कांटे भी हैं,
फैली है उलझन की चादर।
पर्वत चढ़ने की उत्कंठा ,
घाटी में गिर जाने का डर।
नभ की उड़ान
कुछ विहग नीड से जब निकले ,
गुंजायमान भू-गगन हुआ.
मानो वसुधा के प्रांगण में
नवजीवन का आगमन हुआ।
कुछ खेचर ऊपर उड़े बहुत,
कुछ थककर भू पर पड़े रहे।
कुछ बाधाओं में भी अविचल ,
निर्भीक निरंतर खड़े रहे।
वो शाख हुई वीरान घोंसले
छिन्न-भिन्न हो टूट गए।
नभ को छू लेने की ज़िद में ,
संगी-साथी सब छूट गए।
सबने अपने-अपने हिस्से का
आसमान कब्जाया था।
नीचे सुकून की धरती को ,
कब का ही वो तज आया था।
जिन आकाशों का दर्शन भी ,
खग की आँखों को दुर्लभ था।
बंट चुका आज हो खंड- खंड ,
धरती के ऊपर का नभ था।