Thursday, August 18, 2022

कुछ बाकी है

 


अभी मशरूफ हूँ थोड़ा।
अभी कुछ काम बाकी है।
अभी है रास्ता लंबा।
अभी विश्राम बाकी है।

अभी आजीविका से ही
यहां संघर्ष है जारी।
अभी दो-चार जीवन के
असल संग्राम बाकी हैं।
अभी तक तो यहां हमने
सुनी औरों की ही हरदम।
मगर अहले जहां को
मेरा भी पैगाम बाकी है।।
समर पहले ही दिन से छिड़
गया दुनियां में जब उतरा।
अभी भी लड़ रहा हूँ
युद्ध का अंजाम बाकी है।
ज़रा फुरसत मिली है
यार की महफ़िल में बैठा हूँ।
अभी कैसे चला जाऊं,
अभी तो शाम बाकी है।
अभी मत आंकिये मैंने यहाँ,
पाया या क्या खोया।
अभी अनुभव के मेरे और भी
आयाम बाकी हैं।
तबीयत से ज़रा देखो,
तो ईश्वर दिख ही जायेगा।
किसी मे कृष्ण बाकी है
किसी मे राम बाकी है।।

संताप और सृजन

 

जिसमे आनंद-तरंग नहीं,
वह जीवन भी क्या जीवन है?
जिसमे फूलों का रंग नहीं,
वह उपवन भी क्या उपवन है
जो भाव उमड़ते हैं अन्दर,
बहते हैं तो बह जाने दो।
संतापों की दीवार खड़ी,
है मन मे जो ढह जाने दो।
जब अंतरतम की पीड़ाएँ
बन अश्रुबूँद झड़ जाएंगी।
तब मनोवेदना रूप बदल,
रागिनी नई बन आएगी।।
जब कष्ट हृदय का रागिनियों
की धारा में बह जाएगा।
तब बोझिल अंतरतम का आखिर
द्वार स्वतः खुल जायेगा।
फिर पंख चेतना के फैलाकर,
मन विहरेगा "नील गगन"
भावों के कण "चुग लाएगा"
होगा नित नूतन गीत सृजन।।

क्या लिखूं?

 

कुछ सावन की बरसात लिखो। कुछ बचपन की सौगात लिखो।

कुछ स्कूल -दिनों की याद लिखो। कुछ विघ्न और ब्याघात लिखो।


कुछ जीवन के अरमान लिखो। कुछ विघ्न और ब्यवधान लिखो।

जिस सीढ़ी से चलकर आये। उस की थोड़ी पहचान लिखो।


जीवन पथ पर चलते-चलते, देखे कैसे कैसे सपने?

कितनों ने खुद का साथ दिया? कितने पथ में बिछड़े अपने?


कैसे विद्यालय का प्रांगण, एक तपोभूमि -पूजास्थल था।

कक्षाओं की दीवारों में कैसे दिखता उज्ज्वल कल था।


कक्षाओं के अंदर बाहर ज्यामिति के चर्चे होते थे।

हाँ लिखो रसायन-भौतिक की चर्चा में कैसे खोते थे !


है याद तुम्हें एक छोटी सी वो "कालकोठरी" की चौकी?

लिख डालो कैसे नींव डली थी वहाँ अनगिनत सपनों की।


कैसे पड़ाव जब हुआ पूर्ण आगे को कर प्रस्थान चले।

स्मृतियों की गठरी को बांधे, मन मे लेकर अरमान चले।


जीवन के राग-उमंग लिखो।बहता आनंद -तरंग लिखो।

अरमा की डोर पतंग लिखो।होली के ढोल मृदंग लिखो


कैसे पथ में पत्थर आये, कैसे कब कब संग्राम हुआ।

लिख डालो कैसे थक जाने पर भी न तनिक विश्राम हुआ।
........


Wednesday, August 17, 2022

आकांक्षा और आशंका

कुछ पा लेने की ललक हुई,

कुछ गन्तब्यों ने ललचाया। 

पग आगे बढ़ने लगा किन्हीं ,

अनजान अनिश्चित राहों पर। 


राहों ने बँटकर प्रश्न किया ,

आगे किस पथ पर जाओगे?

फिर ब्यंग्य कसा , जाओ जिस पथ 

एकाकी खुद को पाओगे। 


मन की दुनियां में भावों का 

सागर अविरल लहराता है,

कर चेतनता को भ्रमित जाल 

उलझन का नया बिछाता है। 


रोड़े भी हैं , कांटे भी हैं,

फैली है उलझन की चादर। 

पर्वत चढ़ने की उत्कंठा ,

घाटी में गिर जाने का डर। 

नभ की उड़ान

कुछ विहग नीड से जब निकले ,

गुंजायमान भू-गगन हुआ. 

मानो वसुधा के प्रांगण में  

नवजीवन का आगमन हुआ। 


कुछ खेचर ऊपर उड़े बहुत,

कुछ थककर भू पर पड़े रहे। 

कुछ बाधाओं में भी अविचल ,

निर्भीक निरंतर खड़े रहे। 


वो शाख हुई वीरान घोंसले 

छिन्न-भिन्न हो टूट गए। 

नभ को छू  लेने की ज़िद में ,

संगी-साथी सब छूट गए। 


सबने अपने-अपने हिस्से का 

आसमान कब्जाया था। 

नीचे सुकून की धरती को ,

कब का ही वो तज आया था। 


जिन आकाशों का दर्शन भी ,

खग की आँखों को दुर्लभ था। 

बंट चुका आज हो खंड- खंड ,

धरती के ऊपर का नभ था।