कुछ पा लेने की ललक हुई,
कुछ गन्तब्यों ने ललचाया।
पग आगे बढ़ने लगा किन्हीं ,
अनजान अनिश्चित राहों पर।
राहों ने बँटकर प्रश्न किया ,
आगे किस पथ पर जाओगे?
फिर ब्यंग्य कसा , जाओ जिस पथ
एकाकी खुद को पाओगे।
मन की दुनियां में भावों का
सागर अविरल लहराता है,
कर चेतनता को भ्रमित जाल
उलझन का नया बिछाता है।
रोड़े भी हैं , कांटे भी हैं,
फैली है उलझन की चादर।
पर्वत चढ़ने की उत्कंठा ,
घाटी में गिर जाने का डर।
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