Thursday, August 18, 2022

संताप और सृजन

 

जिसमे आनंद-तरंग नहीं,
वह जीवन भी क्या जीवन है?
जिसमे फूलों का रंग नहीं,
वह उपवन भी क्या उपवन है
जो भाव उमड़ते हैं अन्दर,
बहते हैं तो बह जाने दो।
संतापों की दीवार खड़ी,
है मन मे जो ढह जाने दो।
जब अंतरतम की पीड़ाएँ
बन अश्रुबूँद झड़ जाएंगी।
तब मनोवेदना रूप बदल,
रागिनी नई बन आएगी।।
जब कष्ट हृदय का रागिनियों
की धारा में बह जाएगा।
तब बोझिल अंतरतम का आखिर
द्वार स्वतः खुल जायेगा।
फिर पंख चेतना के फैलाकर,
मन विहरेगा "नील गगन"
भावों के कण "चुग लाएगा"
होगा नित नूतन गीत सृजन।।

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