ग़ालिब ने कहा, क्या खूब कहा,
एक आफताब ही काफी था ,
फिर चाँद फलक पर क्यों उतरा ,
अपना तेवर दिखलाने को ?
दिन भर की तपिश मिटाने को ,
पलकें क्या बंद करी हमने ,
वो आ धमका बन बहरूपिया ,
रातों को हमें चिढ़ाने को।
इतनी क्या समझ नहीं तुझको,
रातों को भूत भटकते हैं ?
किनको दिनमणि संग चैन नहीं ,
वे ही रातों को जागते हैं?
पर शायद पूर्व जनम में धरती
से तेरा कुछ नाता था ,
इस कारण सब धरती वासी,
तेरे कुछ न कुछ लगते हैं।
क्यों भटक रहे हो एकाकी,
तुम युगों-युगों नीरव नभ में ?
चांदी सी सुन्दर शक्ल लिए,
दिखते लेकिन केवल "शब् " में?
पर क्या ये सब तुम सदियों से ,
बे-अर्थ ही किये जाते हो?
या इसमें कोई राज छिपा,
जिसको न हमें बतलाते हो?
"रे मनुज!,सुनो, अब और नहीं
अपमान में जलने पाऊंगा।
दिन रात तुम्हारे ब्यँग्यवाण सह ,
और न चलने पाऊंगा।
"चांदी सी शक्ल नहीं मेरी ,
यह दग्ध ब्यथित मेरा तन है।
दिन रात तपिश सहते रहना
ही हुआ आज यह जीवन है।
"जब पुरखे भी तेरे धरती पर ,
पाँव नहीं रख पाए थे।
जब नहीं किसी कोने में भी ,
जीवन के बीज समाये थे। "
"तब से ही हूँ मैं विचार रहा,
अम्बर पथ पर अविचल अविरल।
वसुधा से दूर न जा भटकूं ,
बस चाह रही इतनी केवल।
"सूरज के तेज थपेड़ों को ,
झेला है मैंने सदियों से।
मैं रहा सदा इतने वर्षों,
महरूम जंगलों -नदियों से "
"सैंकड़ों , हज़ारों चट्टानों की ,
चोटें भी मैंने खायीं।
हैं जख्म बयां करते मेरे ,
पर्वत क्रेटर की गहराई। "
"इन जख्मों को ही तुम मेरे,
चेहरे का दाग समझते हो।
शशि से चेहरे की उपमा को
जीवन का भाग समझते हो। "
"तुम तो धरती के आँचल में ,
जीवन आनंद उठाते हो।
पर निष्ठुर हो मेरी दुर्गति
में कौतुहल बस पाते हो। "
"ऐ मनुज! कल्पना में तेरी ,
अब और न सजने पाऊंगा।
तेरे विनोद और कौतुहल का
पात्र न बनने पाऊंगा। "
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