क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?
ज़रा सी कहीं क्या हुई सुगबुगाहट,
लगे ढूंढने उसमे नीयत किसी की।
उधर मेघ गरजा या तूफ़ां क्या आया ,
नज़र आयी इसमें भी साजिश किसी की।
नेकी में भी कुछ बदी ढूंढ लाकर ,
शरारत ही बस हर जगह ढूंढते हो?
क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?
माना ज़माना नहीं नेक लेकिन ,
मगर नेक कब सारी दुनियां रही है?
कहाँ तय था सब मन मुताबिक ही होगा?
जो दस्तूर कल था वो अब भी वही है।
मगर फूल के बीच कांटे दिखाकर ,
शिकायत ही बस हर जगह ढूंढते हो?
क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?
वतन के लिए गोलियां जिसने खायी ,
वतन के लिए जिसने जान तक गवाई ,
न हिन्दू थे, मुस्लिम थे , न वे ईसाई ,
सभी वीर थे हिन्द के बस सिपाही।
शहादत को भी मज़हबी रंग देकर ,
सियासत ही क्यों हर जगह ढूंढते हो?
क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?
विषमता नियम है, अगर देख पाओ ,
कहीं पर शिखर तो कहीं घाटियां हैं।
कहीं पर मरुस्थल की फ़ैली है चादर ,
रंगी कहीं पर बिछी वादियां हैं।
नतीजा-ए -साजिश इन्हे भी बताकर ,
कलह की वजह हर जगह ढूंढते हो।
क्यों बे-वजह तुम वजह ढूंढते हो?
ज़रा सी कहीं क्या हुई सुगबुगाहट,
लगे ढूंढने उसमे नीयत किसी की।
उधर मेघ गरजा या तूफ़ां क्या आया ,
नज़र आयी इसमें भी साजिश किसी की।
नेकी में भी कुछ बदी ढूंढ लाकर ,
शरारत ही बस हर जगह ढूंढते हो?
क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?
माना ज़माना नहीं नेक लेकिन ,
मगर नेक कब सारी दुनियां रही है?
कहाँ तय था सब मन मुताबिक ही होगा?
जो दस्तूर कल था वो अब भी वही है।
मगर फूल के बीच कांटे दिखाकर ,
शिकायत ही बस हर जगह ढूंढते हो?
क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?
वतन के लिए गोलियां जिसने खायी ,
वतन के लिए जिसने जान तक गवाई ,
न हिन्दू थे, मुस्लिम थे , न वे ईसाई ,
सभी वीर थे हिन्द के बस सिपाही।
शहादत को भी मज़हबी रंग देकर ,
सियासत ही क्यों हर जगह ढूंढते हो?
क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?
विषमता नियम है, अगर देख पाओ ,
कहीं पर शिखर तो कहीं घाटियां हैं।
कहीं पर मरुस्थल की फ़ैली है चादर ,
रंगी कहीं पर बिछी वादियां हैं।
नतीजा-ए -साजिश इन्हे भी बताकर ,
कलह की वजह हर जगह ढूंढते हो।
क्यों बे-वजह तुम वजह ढूंढते हो?
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