Tuesday, July 4, 2017

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

ज़रा सी कहीं क्या हुई सुगबुगाहट,
लगे ढूंढने उसमे नीयत किसी की।
उधर मेघ गरजा या तूफ़ां क्या आया ,
नज़र आयी इसमें भी साजिश किसी की।
नेकी में भी कुछ बदी ढूंढ लाकर ,
शरारत  ही बस हर जगह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

माना ज़माना नहीं नेक लेकिन ,
मगर नेक कब सारी  दुनियां रही है?
कहाँ तय था सब मन मुताबिक ही होगा?
जो  दस्तूर कल था वो अब भी वही है।
मगर फूल के बीच कांटे दिखाकर ,
शिकायत ही बस हर जगह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह ढूंढते हो?

वतन के लिए गोलियां जिसने खायी ,
वतन के लिए जिसने जान तक गवाई ,
न हिन्दू थे, मुस्लिम थे , न वे ईसाई ,
सभी वीर थे हिन्द के बस सिपाही।
शहादत को भी मज़हबी रंग देकर ,
सियासत  ही क्यों हर जगह ढूंढते हो?

क्यों बेवजह तुम वजह  ढूंढते हो?

विषमता नियम है, अगर देख पाओ ,
कहीं पर शिखर तो कहीं घाटियां हैं।
कहीं पर मरुस्थल की फ़ैली है चादर ,
रंगी कहीं पर बिछी वादियां हैं।
नतीजा-ए -साजिश इन्हे भी बताकर ,
कलह की वजह हर जगह ढूंढते हो।

क्यों बे-वजह तुम वजह ढूंढते हो?






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