मयूराक्षी की तटी से सटी है
तलहटी हिजला पहाड़ी की।
तलहटी से तनिक ऊपर ,
एक निर्जन शांत पर ,
पत्थरों को तोड़ने में ,
भाग्य फूटे जोड़ने में ,
ब्यस्त थी एक अकेली
मजदूरनी दिनभर निरन्तर।
बगल में कुछ दूर हटकर
पत्थरों की शायिका पर ,
कालक्रम से ग्रसित शिशु मजदूरनी का,
भाग्य से अनभिग्य बेसुध सो रहा था।
तभी सहसा हथौड़े की चोट पाकर ,
एक पत्थर ज़ोर से उछला छिटककर ,
लगा शिशु के फूल से कोमल बदन पर ,
लगी बहने रक्त की धारा निरंतर।
गोद में सु त को उठाकर ,
चक्षुओं में अश्रु भर ,
लाचार वो मजदूरनी ,
रोने लगी सु त संग बिलखकर।
कभी खुद को कोसती ,
फिर कभी विधि से पूछती ,
"जो पा रही वह आज है,
किस जन्म का अभिशाप है ?"
"क्यों आज मेरा श्रम बना है
शत्रु मेरे स्नेह का?
क्यों छा रहा है मेघ ऊपर ,
अपरिमित दुःख क्लेश का?"
पर यहां उसके सवालों
का भला दे कौन उत्तर?
हो चुकी दुनियां अखिल
उसके लिए है आज पत्थर।
सत्य ही ये बात कुछ
ऋषि -ज्ञानियों ने है कही।
बदनसीबों के लिए
संसार में कुछ भी नहीं।
गर्त्त भी दुःख क्लेश का
पर्याप्त है गहरा नहीं।
वक्त भी परवाह उनकी ,
कर कभी ठहरा नहीं।
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