जब वसुधा थी जीवन -विहीन
संसार समग्र तमोमय था ,
अज्ञान अम्बुनिधि लहराता ,
चहुंओर निरन्तर निर्भय था।
कण कण में पृथ्वी के प्रतिपल
घनघोर शिथिलता थी छाई।
चेतना अचेतन सोयी थी ,
जड़ता लेती थी अंगड़ाई।
तब दूर कहीं दुर्गमथल से
परिवर्तन की आंधी आयी,
जग ने त्यागा शैथिल्य और
मृदु मंद-मंद नव गति पायी।
विधि ने वसुधा के प्रांगण में ,
एक नव प्रकाश जो फैलाया ,
तम दूर हुआ सार जग का,
स्वर्णिम विहान भू पर आया।
फिर अंतहीन सागर ताल से
फूटा जीवन का एक अंकुर।
जल -थल -अम्बर सब मुदित हुए ,
यूँ उमड़ी जीवन -धार मधुर।
कलांतराल में धरती ने ,
मानव जीवन को जन्म दिया।
हम सबने अपने कर्मों से।
धरती माता को धन्य किया।
नैसर्गिक कृति पर हो विस्मित ,
मानवता थी अतिशय पुलकित ,
नव ज्ञान पुंज से आलोकित ,
जन मानस था अति आह्लादित।
यह कोई देव -करिश्मा था ,
थी नए विश्व की परछाई।
छिन्नकर कई अवरोधों को,
सभ्यता धरा पर थी आई।
आसीन तरणि पर मानस की,
अब हम करने को सैर चले ,
शुचि ज्ञान समंदर के जल में,
अज्ञात कभी जो था पहले।
उठती गिरती लहरों से जब,
नैनों के साक्षात्कार हुए।
भावातिरेक मन में शब्दों के ,
कुछ ऐसे उदगार हुए।
" इस नए विश्व में जन म न में ,
नूतन ख़याल अब आएंगे ,
विज्ञान -कला के विविध क्षेत्र ,
आयाम नए तब पाएंगे।
मेदिनी स्वर्ग बन जाएगी ,
परिवर्तन ऐसे आएंगे।
समृद्धि-सेतु निर्मित होगा ,
हम रत्न गगन के लाएंगे। "
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