Tuesday, February 13, 2018

बूढी हवेली का मर्म


रहे न रहनेवाले ही , कहाँ फिर गुफ्तगू होगी ?
मगर खाली मकानों की भी तो कुछ आरज़ू होगी ?

कई वर्षों से कोई अब हमारे दर नहीं आता।
उन्हें अपने ही बचपन का ये शायद घर नहीं भाता।

मगर मेरा अभी भी उन सभी से है वही नाता।
नहीं आने, न जाने से ये ताल्लुक मर नहीं जाता।

कभी यह घर ख़ुशी का , प्रेम का सुन्दर बगीचा था।
जिसे दादी  ने, माँ ने , स्नेह-जल से रोज़ सींचा था।

समय के वेग में  धूमिल हुए, बिखरे सभी मंज़र।
नियति की नीति में जाने छिपा था , कौन सा खंजर ?

नहीं आँगन में अब वो पायलों की गूँज बजती है।
नहीं दीवालियों में देहरी दुल्हन - सी सजती है।

रसोई से न अब पकवान की खुशबू महकती है।
वो सुन्दर कोठरी बे-नूर अब बेवा -सी दिखती है।

न ढेंकी -घर से कुछ कुटने की अब आवाज आती है।
न घर की नारियां , उत्साह से चक्की चलाती हैं।

कहाँ अब भगवती-घर में वो मंत्रोच्चार होता है ?
कहाँ अब पाठ -पूजा-सांझ-व्रत-ब्यवहार होता है ?

न तुलसी -पिंड में अब नित सुमन श्रद्धा के खिलते हैं ,
न प्रतिदिन सांझ के स्वागत में संध्या-दीप  जलते हैं।

गृहिणियां -बालिकाएं अब नहीं अठखेलियां करतीं ,
नहीं आँगन को, घर को , नित्यप्रति आनंद से भरतीं।

न दिखता बैठकी में बैठकों का दौर अब अक्सर ,
न बाबूजी का वो शासन, न ही काका के वो तेवर।

न जाने कब से है सूनी पड़ी , बैठक की वो चौकी ,
जहां ढाली गयी थी अनगिनत ही नीव सपनों की।

वो सावन में सभी का खेत जाकर बीज बो आना ,
वो अगहन में फसल को खेत से घर काट कर लाना।

पुआलों को बड़े ही यत्न  से छत पर सजा लेना।
ज़रुरत में कभी चारा , कभी ईंधन बना लेना.

वो "डमरू" और वह "जगदीश" अब घर पर नहीं आते?
फसल-खेतों की, बीजों की, कहाँ होती हैं अब बातें?

मवेशी अब कहाँ गोहाल की शोभा बढ़ाते हैं?
कहाँ गोधूलि में पगधूलि, अम्बर में उड़ाते हैं?

दशहरे में अखिल परिवार का एक साथ ही मिलना ,
सुमन आनंद-श्रद्धा-स्नेह का एक साथ ही खिलना।

सभी बातें हैं अब किस्से किसी गुजरे ज़माने के।
मगर अनमोल हीरे हैं वे स्मृतियों के खजाने के।

वो आँगन -देहरी प्रतिदिन किसी की राह तकती हैं ,
रसोई - कोठरी यादों में अपनों की  सिसकती हैं।

समय की मार से बीमार जर्जर हो रहा हूँ मैं,
डिगे रहने की हिम्मत और ताकत खो रहा हूँ मैं।

अकेला मैं यहाँ सूनी गली से बात करता हूँ ,
दुआ सबकी कुशलता की मगर दिन रात करता हूँ।

पुराने पेड़ ही अब कुछ बचे साथी यहां मेरे।
अतिथि बन रोज़ आते हैं कबूतर -वृन्द बहुतेरे।

कभी गर याद आऊं , मुझसे मिलने तुम चले आना।
धरोहर हूँ तुम्हारे पूर्वजों की तुम न सकुचाना।

(संजय : १३-०२-२०१८)


1 comment:

  1. बहुत ही खूबसूरत रचना। बचपन की यादें ताज़ा हो गई। सादर धनयवाद ।

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