अंतरतम की पीड़ाएँ जब अश्रु बूँद बन झरती हैं ,
मनोवेदना रागिनियों का लेकर रूप घुमड़ती हैं।
कष्ट ह्रदय का रागिनियों की धारा में घुल जाता है।
बोझिल अंतरतम का तब फिर द्वार स्वतः खुल जाता है।
मनोवेदना निकल जेहन से दूर कहीं खो जाती है।
हर्ष, प्रेम , उत्साह -पुंज के बीज नए बो जाती है।
पंख चेतना के फैलाकर मन चहुँ-ओर विहरता तब।
चुग आता भावों के कण नित और सृजन कुछ करता नव।
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