वतन में फैलती ही जा रही कैसी बिमारी है ?
कहीं दंगों से तन जख्मी, कहीं बेरोज़गारी है।
खजाने के खजाने लग गए सरकार के लेकिन ,
ज़मीनी जंग ग़ुरबत से यहाँ पर अब भी जारी है।
कहीं पर दिन दहाड़े आबरू लुटती है सड़कों पर ,
कहीं ईमानदारी पर फरेबी तंत्र भारी है।
धरम के नाम पर ही सैकड़ों मिटते -मिटाते हैं।
घृणा मन में पले यह आस्था कैसी हमारी है ?
कई टुकड़ों में बंटकर लोग आपस में झगड़ते हैं ,
वतन पर चल रही कैसी ये नफरत की कटारी है ?
न हो तालीम से महरूम , ना भूखा रहे कोई।
नहीं क्या हिन्द के हर शख्श की ये ज़िम्मेदारी है ?
चतुर्दिक छ रहा ऐसा प्रदूषण का अज़ब मंजर ,
हुई दूषित हवा, बीमार नदियाँ , आज सारी हैं।
ज़रा झकझोर लो मन को , ज़रा तन्द्रा से तुम उबरो ,
सम्हालो तुम उजड़ती जा रही बगिया जो प्यारी है।
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