मैं इंसान तो नहीं, पर भावनाएं रखता हूँ. स्मृतियों को संजोता हूँ। पर शायद कोई इंसान मेरी भावनाएं नहीं समझ सकता। कोई मेरी स्मृतियों तक नहीं पहुँच सकता। शायद मेरी कहानी कोई भी सत्यता और सम्पूर्णता से बयां नहीं कर सकता। इसलिये मुझे अपनी कहानी खुद ही बयान करनी पड़ेगी।
* जिस तरह गीता में कहा गया है, आत्मा का अस्तित्व कभी खत्म नहीं होता , सिर्फ उसके शरीर का स्वरुप बदलता है। उसी प्रकार मेरा भी कभी अस्तित्व खत्म नहीं हुआ। मेरा भी रूप बदला है, जीर्णोद्धार हुआ है। यूं कहें मेरी भी कई पीढ़ियां अस्तित्व में आयीं और विलुप्त हो गयीं। आज मेरा वर्तमान स्वरूप मेरे अतीत के स्वरुप से काफी अलग है। पर स्मृतियों की कड़ियाँ मेरे मन मस्तिष्क में सिलसिलेवार ढंग से जुडी हुई हैं. मैं आज भी अपने अतीत को उतनी ही मार्मिकता से अनुभव कर सकता हूँ , जितना कि अपने वर्तमान को. मेरे अतीत की स्मृतियाँ और मेरी भावनाएं , मेरे कण कण में ब्यापित हैं। आप सोचते होंगे , मैं कौन हूँ और क्यों अपनी कहानी बयान करना चाहता हूँ ?मेरी कहानी को भविष्य की पीढ़ियों के लिए जीवित रखना क्यों ज़रूरी है? इसे समझने के लिए यह समझना ज़रूरी है की मेरा अस्तित्व और मेरा इतिहास सिर्फ मुझ तक सीमित नहीं है। मुझसे कई पीढ़ियों का जीवन-इतिहास और उनकी यादें जुडी हैं। मेरी कहानी आगे के पीढ़ियों को उनके अतीत से/उनके जड़ से जुड़ने में मदद करेगी। शायद कुछ सालों/दशकों में मेरा खुद का ही अस्तित्व न रहे। अतः अपने जीते जी , अपनी कहानी कह देना चाहता हूँ। तो पहले अपना परिचय दे दूँ। मैं हूँ सारठ ग्राम में बाभन टोला स्थित पोद्दार निवास। सारठ - आज के देवघर जिले का एक छोटा सा गॉंव जो झारखण्ड के संथाल परगना में है। वर्तमान में मैं एक दो-मंजिले पक्के मकान के रूप में विद्यमान हूँ , पर मेरा स्वरुप हमेशा ऐसा नहीं था। कभी यहां पर मेरी जगह मिटटी के छोटे-छोटे घर हुआ करते थे जो कालांतर में पक्के मकान में तब्दील होते गए। मैंने पोद्दार वंश की कई पीढ़ियों को देखा है. उन पीढ़ियों के जीवन में आते जाते अनेकों उतार चढ़ाव को देखा है। वे सारी स्मृतियाँ मेरी दीवारों के कणों में कैद हैं। सच कहूँ - मेरी कहानी पोद्दार परिवार के संघर्ष और विस्तार की कहानी से जुडी हुई हैं। परन्तु इस कहानी को ठीक से समझने जानने के लिए, समय समय पर बदलती सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को भी जानना ज़रूरी है।
पृष्ठभभूमि
* पोद्दार वंश स्वर्णकार जाति के अंतर्गत कनौजिया उपजाति का हिस्सा है। इस वंश का सारठ में आगमन कब हुआ, कैसे हुआ , इसके बारे में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। पर ऐसा माना जाता है कि पोद्दार वंश के पूर्वज किसी ज़माने में कन्नौज के वासी थे और कालन्तराल में उनके वंशजों की एक शाखा विस्थापित होते होते वर्तमान के सारठ गाँव में करीब तीन चार सौ वर्ष पूर्व पहुंची। सारठ क्षेत्र, संथाल परगना (परगना जो मूलतः एक पारसी शब्द है और आज के सन्दर्भ में जिसका अर्थ जिला मान सकते हैं , मुग़ल सल्तनत के ज़माने से एक प्रमुख प्रशाशनिक इकाई है। ) के दक्षिणी पश्चिमी हिस्से में स्थित है. , यहां बस्तियां क्यों बसी होंगी , इसका अनुमान लगाया सकता है। कई कारणों में से एक मुख्य कारण है -इस भू-भाग का नदियों से निकट होना। अजय नदी और इसकी सहायक छोटी नदियां /धाराएँ आज भी इस क्षेत्र की जलापूर्ति का मुख्य स्रोत हैं। उस समय का सारठ आज के सारठ से काफी अलग था ।बस्तियों के नाम पर बस कुछ मकान और सारा इलाका जंगलों-झाड़ियों से भरा हुआ। कृषि और कुछ छोटे मोटे कुटीर उद्योग आजीविका के मुख्य साधन थे। वैसे भी संथाल परगना, संथाल आदिवासियों की मूल भूमि रही है. परन्तु समयांतराल में विभिन्न जातियों-प्रजातियों के गैर -आदिवासी (दिकू= आउटसाइडर)) सुदूर प्रदेशों से आकर इस इलाके में बसते चले गए। इसका प्रभाव यहां की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाओं पर पड़ा है. साथ ही समय समय पर देश और प्रदेश की बदलती राजनैतिक ब्यवस्थाओं का भी इस इलाके की सामाजिक , आर्थिक और सामाजिक विरासत पर गहरा असर पड़ा है। समय और बदलती ब्यवस्थाओं की अनगिनत परतों के बीच से पुरानी पीढ़ियों के जीवन की सच्ची तसवीर निकाल लाना मुश्किल है , परन्तु उन जीवन शैलियों, उन ब्यवस्थाओं से भविष्य की पीढ़ियां भी किसी न किसी रूप में प्रभावित होती हैं । जिस प्रकार धरती पर जीव जंतुओं की जीवन लीला आसमान में मौजूद सूर्य और चाँद की लीलाओं से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार एक छोटे कसबे में जी रहे एक छोटे समुदाय की जीवन पद्धति और वहाँ की सामजिक-आर्थिक संरचना की चादर भी सूर्य-चंद्र की भाँति विद्यमान सत्ताओं की लीलाओं के अनुसार ही निर्मित होती और बिखरती है। और जो ब्यवस्थाएँ हम से जितनी पास होती हैं, अथवा जितनी सशक्त होती हैं, उनका प्रभाव भी हमारे जीवन पर उतना ही अधिक पड़ता है।
*१९ वीं सदी के उत्तरार्ध में पोद्दार वंश की एक छोटी सी बस्ती सारठ में स्थापित हो चुकी थी। इस बस्ती में कई परिवार रहते थे। उस वक्त तक हिन्दुस्तान पर अंग्रेजों का आधिपत्य चरम पर था। आज का सारठ उस समय बंगाल प्रान्त का हिस्सा हुआ करता था। और बंगाल प्रान्त ही अंग्रेजों की हुकूमत का मुख्य केंद्र था। अतः उस वक्त की राजनैतिक गतिविधियों एवं स्वतंत्रता संग्राम की ज्वालाओं से सारठ भी अछूता नहीं था। किसी प्रकार की विद्रोही हलचलों का दमन करने हेतु फिरंगी सरकार की पुलिस को गलियों में गश्त करते हुए अक्सर देखा जा सकता था। आम जनों और ज़मींदारों पर ब्रिटिश हुकूमत की पैनी नज़र रहती थी। प्रशाशन के नाम पर बस जैसे कर वसूलना ही सरकार का मुख्य काम था। और इस कर वसूली का अधिकार सरकार ने ज़मींदारों को दिया हुआ था। स्थायी बंदोबस्त के अनुसार ज़मींदारों को इलाके का मालिकाना हक़ था और इस हक़ का इस्तेमाल कर वे ब्रिटिश शाशकों के लिए कर वसूलते थे। नतीज़तन , ज़मींदार खेतिहरों से कितना कर वसूलें, कैसे वसूलें इसमें उनकी खुद की मर्ज़ी चलती थी। कृषि और कुटीर उद्योग ही आजीविका के मुख्य साधन थे। सरकार के लिए कर वसूली के नाम पर किसानों एवं रैयतों पर ज़ुल्म करना और उनका शोषण करना आम बात थी। चूंकि ज़मींदारी प्रथा का बोलबाला था , अतः एक निश्चित भू-भाग पर कृषि का अधिकार ज़मींदार की कृपा पर ही संभव था. बदले में खेतिहर किसानों को उपज का एक अधिकांश हिस्सा कर स्वरुप ज़मींदार को देना पड़ता था। जो खेतिहर किसान निश्चित समय पर कर नहीं दे पाते थे उन्हें अपनी खेती की ज़मीन से बेदखल होना पड़ता था। नतीज़तन अपनी ज़मीन को बचाने के लिए कृषक (पीजेन्ट्स) अक्सर सेठ साहूकारों के चंगुल में फंस जाते थे। साहूकार अक्सर इसका फायदा उठाकर कृषकों की ज़मीन हड़प लेते थे। चूंकि बंगाल ब्रिटिश शाशन का मुख्य केंद्र था और ब्रिटिश सरकार को अपने साम्राज्यों को सुदृढ़ करने के लिए अधिक से अधिक धन की आवश्यकता थी , इस प्रदेश में कर वसूली की दर अन्य प्रदेशों से ज्यादा थी। इस तरह आम कृषक ज़मींदारों और साहूकारों के ब्यूह में फंसकर शोषण का शिकार होने को मज़बूर थे।यूं कहें शाशन तंत्र और शोषण तंत्र मिलकर प्रजा को लूटते थे और उनपर अत्याचार करते थे। पोद्दार परिवार भी इस जटिल शोषण ब्यवस्था से अछूता नहीं था। समय समय पर कुछ वर्गों ने ज़मींदारों,साहूकारों और ब्रिटिश प्रशाषकों के अत्यधिक शोषण एवं ज़ुल्म के खिलाफ लड़ने की हिम्मत भी दिखाई। १८ ५५-५६ का संथाल विद्रोह इसी लड़ाई का एक हिस्सा है।
* ऐसे राजनैतिक, प्रशाशनिक और शोषण के माहौल में पोद्दार वंश की एक शाखा , जिसमे कई परिवार थे, सारठ गाँव के एक छोटे से हिस्से में किसी प्रकार अपने अस्तित्व को सम्हालने और उसे आगे बढ़ाने में प्रयत्नशील थी। आज उस हिस्से को बाभन टोला के नाम से जाना जाता है। आज भी यह हिस्सा गाँव के बिलकुल आखिरी छोर पर है। इसके आगे या तो बस दलितों के कुछ मकान हैं अथवा खेत -खलिहान। यह आज की परिस्थिति है। उन्नीसवीं सदी में इन जगहों पर जंगल झाड़ रहे होंगे जो कलान्तराल में खेतों में तब्दील हो गए। गाँव के भीतर भी किसको कहाँ स्थान मिलेगा , यह इस बात पर निर्भर करता कि , उस वक्त की सामाजिक संरचना में किसी का क्या स्थान है। अतः जहां सामाजिक आर्थिक रूप से सशक्त लोगों को इलाके की मुख्य जगहों पर स्थान मिला, वहीं कमजोर और वंचित लोगों को गाँव के आखिरी छोर पर। स्वर्णकार समाज का हिस्सा होने के कारण पोद्दार परिवार को सारठ क्षेत्र की सामजिक सरंचना में तुलनात्मक रूप से नीचे के क्रम में गिना जाता है , यद्यपि अन्य कई जातियों से ऊपर स्थान हासिल है। सारठ के ब्राह्मण और कायस्थ आर्थिक , शैक्षणिक और सामजिक रूप से स्वर्णकारों से बेहतर स्थिति में थे।
* सामजिक संरचना की दृष्टि से सारठ कई जातियों के लोगों की कर्मभूमि रहा है। स्वर्णकार के अलावे इस गाँव में ब्राह्मण, कायस्थ , वणिक , धानुक , कोइरी, कुम्हार , कहार, मुसहर इत्यादि जातियों के लोग रहते हैं। गाँव के पूर्वी भाग में मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं. कुल मिलाकर यह मिश्रित आबादी वाला क्षेत्र रहा है।सारठ की ज़मींदारी ठाकुर साहब के परिवार के पास थी। इस इलाके में ठाकुर साहब को लगभग राजा का स्थान हासिल था। प्रतिदिन उनकी हवेली में दरबार लगता था और न्याय-अन्याय के फैसले सुनाये जाते थे। यों कहें ठाकुर साहब ही इस इलाके के लोगों के भाग्य विधाता थे। आज भी उनकी ह्वेली (यद्यपि अब लगभग एक खंडहर बन चुकी है) वहां के लोगों का विस्मय और अचरज का विषय है। गाँव के बड़े बूढ़े , नयी पीढ़ियों को इस हवेली से जुडी अनेकों कहानियां सुनाते नहीं थकते।
* अन्य समुदायों की तरह सारठ का स्वर्णकार समुदाय भी मुख्य रूप से कृषि पर आश्रित था। साथ ही इस समुदाय के लोग स्वर्ण-कारीगरी के कुटीर उद्योग में भी शामिल थे। ऐसा माना जाता है कि किसी समय पोद्दार परिवार के मुखिया ठाकुर साहब के घर में आभूषण बनाने का काम करते थे। इस काम के एवज में उस समय के ठाकुर साहब ने उन्हें सारठ गाँव में कुछ ज़मीन (करीब १५ बीघा) पुरस्कार स्वरुप प्रदान की थी जिससे कि पोद्दार परिवार खेती कर अपना गुजर बसर कर सके। आज भी यह कृषि भूमि पोद्दार परिवार की अमूल्य धरोहर है। इसे हम लोहचीबाद और डाबर के नाम से जानते हैं।ज़मीनों के आधिपत्य की कोई ठोस ब्यवस्था नही होने के कारण ठाकुर साहब ने जिसको जो ज़मीन आबंटित कर दी वही उसकी ज़मीन मान ली जाती थी। बाद में ज़मीनों का अधिपत्य इस आधार पर निर्धारित होने लगा कि कौन किस ज़मीन पर वर्षों से खेती कर रहा है। समयांतराल में ज़मीन का आधिपत्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित होने लगा।
* स्वर्ण कारीगरी से अर्जित आय के अतिरिक्त ठाकुर साहब द्वारा दी गयी ज़मीन ही पोद्दार परिवार की आजीविका का मुख्य आधार था। सीमित आमदनी में कई हिस्सों में बंटे पोद्दार परिवार का भरण पोषण करना पड़ता था। सभी सदस्य एक सीमित दायरे में मिल-जुलकर रहते थे। संयुक्त परिवार की परंपरा आम बात थी। मुसीबत के वक्त एक दुसरे की मदद के लिए आगे आना भी रीति-रिवाज का हिस्सा था। आस-पास के गाँव स्थित स्वर्णकार समाज से भी ब्यवसायिक और सामाजिक सम्बन्ध अच्छे थे। लेकिन कुल मिलाकर सारठ की कर्मभूमि ही आजीविका और सामाजिक जीवन का मुख्य आधार थी। जैसा कि १९वी सदी के हिन्दुस्तान में आम बात थी , इस परिवार के पुरखों की भी औसत आयु ४५-५० वर्षों तक ही सीमित थी। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच आम तौर पर १८-२० वर्षों का फासला था। ऐसी, सामजिक आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच पोद्दार वंश के पुरखे किसी तरह से अपना अस्तित्व बचाने की जद्दो-जहद कर रहे थे।
* २० वीं सदी के पूर्वार्ध तक पोद्दार -बस्ती कुछ झोपड़ीनुमा घरों के रूप में विद्यमान थी। मिटटी की दीवारें , फूस के छप्पर और लकड़ियों के दरवाजे। हर घर में एक आंगन ज़रूर होता था। अक्सर आँगन के बीच में तुलसी -पिंड स्थापित किया जाता था। परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त पशुओं के लिए भी रहने की ब्यवस्था होती थी। यूं कहें मवेशी भी परिवार के अभिन्न अंग होते थे। पशु और मनुष्य दोनों एक दुसरे पर आश्रित होते थे। पानी के लिए घर में कोई ब्यवस्था नहीं होती थी। या तो गांव के छोर पर बहती अजय नदी पर निर्भर रहना पड़ता था अथवा गाँव/टोले में स्थित सामुदायिक कुँए पर। कुल मिलाकर जीवन पद्धति बिलकुल सरल होती थी।
* बीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच जीवन शैली , आर्थिक गतिविधियां अथवा आर्थिक स्थिति में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ। हाँ परिवार की शाखाएं बढ़ती गयीं और कुछ हद तक पोद्दार -बस्ती का स्वरुप भी बीच बीच में परिवर्तित हुआ। बस्ती घंनी होती गयी और कुछ लोग विस्थापित होकर , सारवां , पालोजोरी या बभनगामा में जा बसे। इन विस्थापनों के बावजूद , पोद्दार परिवार की मूल शाखा और इसके अधिकांश लोग सारठ के सोनार टोला में ही निवास करते थे।
* अगर सत्ताएं दमनकारी एवं संवेदनहीन हों तो रैयतों को ऐसी ब्यवस्था का खामियाजा कई तरह से भुगतना पड़ता है। ब्रिटिश सत्ता का केंद्र बंगाल में होने की वजह से यहां के लोग ऐसी शोषणकारी और संवेदनहीन ब्यवस्था से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। १८ वीं सदी का बीभत्स अकाल (१७७० ईस्वी) जिसमे बंगाल प्रांत की एक तिहाई से भी अधिक आबादी समूल नष्ट हो गयी , ब्रिटिश हुकूमत की इसी दमनकारी राजस्व नीति का परिणाम था। पोद्दार वंश के कितने लोग इस आपदा के शिकार हुए , इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु ऐसा स्पष्ट तौर पर माना जा सकता है कि, यह वंश लगभग समूल विनाश के कगार पर पहुँच गया था और बमुश्किल थोड़े बहुत लोग ही किसी तरह उस अकाल की विनाशलीला से बच पाए । जो थोड़े लोग बच पाए वो अपने को खुशकिस्मत समझते थे , भले ही उनको अत्याचारी शाषन - ब्यवस्था तले जानवरों की तरह ही ज़िन्दगी क्यों न नसीब हो। न जाने कितने लोगों को अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ा और कितनी ही भावी पीढ़ियां जो नयी शाखाओं का रूप ले सकती थीं , अचानक समाप्त हो गयी । मगर बंगाल प्रान्त में पीढ़ियों को बड़े स्तर पर समाप्त करने वाली ये आखिरी आपदा नहीं थी. इस भीषण अकाल के बाद १७ ७३, १८६६ , १८७३ , १८९२ और १८९७ ईo में भी बंगाल प्रान्त के लोगों को कई अकालों का सामना करना पड़ा। इन अकालों के पीछे प्रतिकूल मानसून के साथ साथ अंग्रेजों की दमनकारी कर नीति का भी भरपूर योगदान था।
मानो अकालों की श्रृंखला जनजीवन को तबाह करने के लिए काफी नहीं थी, १९वीं सदी के अंतिम दशक में प्लेग की महामारी ने विकराल रूप लेकर बंगाल प्रांत में परिवारों /समुदायों को निगलना शुरू कर दिया. अनुमानतः १८९६ से १९०५ के बीच करीब एक करोड़ लोग प्लेग की वजह से अपना जीवन गँवा बैठे।** संथाल परगना क्षेत्र में लाखों लोगों की जाने इस त्रासदी में चली गयी. पोद्दार कुल के जो लोग इस भयानक महामारी से किसी तरह बच पाए , उन्होंने अपनी आँखों देखी इस विनाश लीला को नम आँखों से अपनी आगे की पीढ़ियों को बताया। कहते हैं कि मृत्यलीला का मंज़र कुछ इस तरह था कि किसी एक परिवार में अगर एक सदस्य को प्लेग की बीमारी ने जकड लिया तो उसके साथ साथ दो -तीन और सदस्य जो उसकी देखभाल में लगे थे, उनकी भी कुछ सप्ताहों के अंदर ही मृत्यु तय थी । किसी गाँव में अगर एक सदस्य को भी प्लेग की बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया , तो फिर पूरा का पूरा गाँव जल्दी ही इस महामारी की चपेट में आ जाता था। आलम यह था कि जब तक परिवार के लोग एक सदस्य का दाह संस्कार करके लौटते , तब तक किसी दुसरे सदस्य की मृत्यु हो चुकी होती थी। इस महामारी ने बच्चे, वयस्क, वृद्ध , स्त्री, पुरुष सबको अपनी चपेट में लिया। । नतीजा यह रहा की पोद्दार वंश की कुछेक शाखाओं को छोड़कर , बाकी सभी शाखाएं समाप्त हो गयी। दो तीन वर्षों के अंतराल में ही पोद्दार परिवार के ३०-४० सदस्यों की मृत्यु हो गयी। श्री नवाब पोद्दार (जन्म वर्ष १८८६ ) ऐसे कुछ भाग्यशाली सदस्यों में थे , जो अपनी खुद की जीवन लीला समाप्त होने के पहले अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ाने में कामयाब हो पाए। वहीं चचेरे भाइयों या उनके चाचाओं की पीढ़ियां आगे बढ़ने में नाकामयाब रहीं। लगभग विलुप्त होने के कगार पर खड़ी , पोद्दार वंश की आगे की कहानी , वस्तुतः श्री नवाब पोद्दार के वंशजों के संघर्ष, उत्थान और विस्तार की कहानी है।
**Reference: Indian Medical Journal Oct 1906. [Plague in Bengal].
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1800 ईo के आसपास श्री भूषन पोद्दार और उनके भाई श्री बनवारी पोद्दार इस परिवार के मुखिया थे। कालन्तराल में इन दोनों भाइयों का वंश कई शाखाओं में आगे बढा ,परन्तु इनके अधिकाँश वंशज अल्पायु में ही स्वर्ग सिधार गए। बीसवीं सदी के आते आते इनके वंश को आगे बढ़ाने वाले सिर्फ तीन ही वंशज बचे थे- श्री राजा पोद्दार ,श्री नवाब पोद्दार और श्री गुहि पोद्दार। राजा पोद्दार नवाब पोद्दार के चचेरे बड़े भाई थे। गुहि पोद्दार नवाब पोद्दार के गोतिया थे और दूर के चचेरे भाई थे। वस्तुतः वंशावली में छह पायदान ऊपर , श्री गुहि पोद्दार और श्री नवाब पोद्दार के पूर्वज सहोदर भाई थे। श्री नवाब पोद्दार के पिता श्री कारु पोद्दार और उनके बड़े भाई श्री प्रजापति पोद्दार सारठ के ठाकुर साहब के यहां स्वर्ण कारीगरी का काम किया करते थे। चूंकि ठाकुर साहब को इलाके में लगभग राजा का स्थान हासिल था, उनकी हवेली में जेवर- जेवरात बनाने का काम सालों भर चलता रहता था। श्री कारु पोद्दार और श्री प्रजापति पोद्दार को जब भी स्वर्ण कारीगरी के लिए बुलावा आता उन्हें ठाकुर साहब की हवेली में हाज़िर होना पड़ता। इस कार्य के पारिश्रमिक के रूप में ठाकुर साहब ने उन्हें दो अलग अलग जगहों पर -कुल मिलाकर लगभग १५ बीघे की ज़मीन दान कर दी थी जिससे की वे अपने परिवार का गुजर बसर कर सकें। इन भू-खण्डों को हम लोहछिबाद और डाबर के नाम से जानते हैं। स्वर्णकारीगरी के अतिरिक्त लोहछिबाद और डाबर के खेतों से प्राप्त कृषि उत्पाद इस परिवार के जीवन यापन का मुख्य आधार था। कृषि उत्पादों का क्रय विक्रय नहीं किया जाता था। खुद की ज़रूरतें पूरी करने के बाद जो बच जाता उसका कुछ हिस्सा भविष्य की ज़रूरतों के लिए संचित कर दिया जाता और कुछ पड़ोसियों /ज़रूरतमंदों को बाँट दिया जाता था. घर में पल रहे मवेशियों की खाद्यपूर्ति भी इन्ही कृषि उत्पादों से होती थी। घर में आये अतिथियों का यथासंभव विशेष सत्कार होता था। घर आये अतिथियों को भोजन कराना और उपहार स्वरुप कुछ अन्नदान करना पारिवारिक परंपरा का हिस्सा था. अतिथियों , परिजनों के विशेष सत्कार की यह परंपरा पीढ़ियों दर पीढ़ियों आगे बढ़ती रही। कुल मिलाकर संघर्षपूर्ण ही सही पर संतोषपूर्ण जीवन यापन चल रहा था।
* श्री गुहि पोद्दार के दो पुत्र हुए - श्री अस्ति पोद्दार और श्री किशोरी पोद्दार। श्री किशोरी पोद्दार ने सांसारिक मोहमाया को त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लिया , परन्तु श्री अस्ति पोद्दार के वंशज आज भी सारठ के बाभन टोला में निवास करते हैं। अपने पुरखों की भाँति श्री अस्ति पोद्दार भी स्वर्ण कारीगरी का काम किया करते थे। परन्तु उनके पुत्रों ने न तो इस कला को सीखा और न ही इस ब्यापार को आगे बढ़ाने में कोई दिलचस्पी दिखाई।
* उधर श्री कारू पोद्दार और श्री प्रजापति पोद्दार के वंशजों की कहानी बिलकुल अलग राह पर चल रही थी। श्री कारू पोद्दार और श्री प्रजापति पोद्दार मुख्य रूप से ठाकुर साहब के यहां स्वर्ण कारी गारी करते थे।साथ ही उनके द्वारा दी गयी ज़मीन पर खेती बारी का काम सम्हालते थे। ठाकुर साहब के परिवार के संपर्क में रहने की वजह से अक्सर इन दोनों भाइयों पर ठाकुर साहब की कृपा बनी रहती थी। किसी मुसीबत में वे ठाकुर साहब से मदद की गुहार लगा कर सकते थे। इसका लाभ कुछ हद तक उनके पुत्रों को भी प्राप्त हुआ। इन दोनों भाइयों के बाद श्री नवाब पोद्दार और श्री राजा पोद्दार कारीगरी का काम सम्हालने लगे। परन्तु ठाकुर साहब की हवेली पर नियमित जाना नहीं होता था। कभी-कभी ही बुलावा आता था। सोने चांदी का कारोबार घर से ही चलता था। घर के सबसे बाहरी कमरे को दुकान में तब्दील कर दिया गया था। दोनों चचेरे भाई मिल जुलकर कारोबार सम्हालते थे। अन्य सगे-सम्बन्धी भी उसी पोद्दार बस्ती में रहते थे , परन्तु ये दोनों चचेरे भाई एक संयुक्त परिवार की तरह साथ साथ रहते थे। दोनों में काफी मेल था। प्लेग की तबाही के बाद इनके कुछ सगे सम्बन्धी वंशहीन हो स्वर्ग सिधार गए और कुछ अन्य गाँव छोड़कर बाहर चले गए। उनके हिस्से का घर और ज़मीन इन दोनों भाइयों के अधिकार क्षेत्र में आ गया।
* सन २० वीं सदी के पहले दशक तक दोनों भाइयों की शादी हो चुकी थी । संघर्ष का सिलसिला ज़ारी था। प्लेग के तांडव से इनका अपना परिवार भी अछूता नहीं था। श्री राजा पोद्दार की संतान और उनकी पत्नी प्लेग महामारी की भेंट चढ गए। नतीजतन उनका वंश आगे न बढ़ सका। उनके पिता श्री प्रजापति पोद्दार भी स्वर्ग सिधार चुके थे। उधर श्री नवाब पोद्दार की कई संताने हुईं पर सभी बाल्यावस्था में ही काल की भेंट चढ़ गए। २०१० आते आते श्री कारु पोद्दार और उनकी पत्नी का भी देहांत हो चूका था। पोद्दार परिवार में अब बस श्री नवाब पोद्दार , श्री राजा पोद्दार , श्री नवाब पोद्दार की पत्नी और श्री राजा पोद्दार की बूढी माँ बच गयी थी। कारोबार चल रहा था, खेती बारी भी हो रही थी , परन्तु परिवार पर हमेशा किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती थी।
* उधर प्रान्त में स्वदेशी आंदोलन चरम पर था। आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत के सारे प्रशाशनिक तंत्र सक्रिय हो उठे थे। ज़मींदार भी बढ़ चढ़कर इस आंदोलन का हिस्सा बने। आंदोलन का केंद्र बिंदु बंगाल था , अतः आंदोलन का प्रभाव सबसे अधिक इसी प्रान्त मे देखने को मिला. जहां एक ओर अधिकाँश ज़मींदार अंग्रेज़ों का साथ दे रहे थे, वहीं कुछ स्वाभिमानी ज़मींदार भी थे जो आंदोलन का साथ देते नज़र आये। हुकूमत ने आंदोलन की एकता को भंग करने के लिए बंगाल का विभाजन कर दिया, पर इस क़दम ने आंदोलन की आग को और अधिक भड़काया। सारे देश में राष्ट्रीयता की एक नयी भावना जन्म ले रही थी। इसका असर सारठ क्षेत्र पर भी देखने को मिला। स्वदेशी विचार से प्रेरित होकर यहां के लोगों ने भी खेती के साथ -साथ कई प्रकार के हथकरघा और कुटीर उद्योग प्रारम्भ किये। लोगों के दिलों में स्वदेशी की भावना जन्म ले चुकी थी। कहते है की जब जीने के लिए कोई बड़ा उद्देश्य सामने दिख जाय, तो ऐसे में ब्यक्तिगत जीवन की तकलीफें गौण हो जाती हैं। सारे प्रदेश में स्वदेशी आंदोलन की लहर ने लोगों को प्लेग के महासंकट से उबरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लोगों ने अपने अनगिनत प्रियजनों की अकाल मृत्यु के अपरिमित कष्टों को भूलकर एक नए सुबह की उम्मीद में नए उत्साह से जीना शुरू कर दिया। दूसरी और सरकार ने अपने प्रशाशन तंत्र को मज़बूत करने के लिए गाँवों और शहरों को सड़कों से जोड़ना शुरु कर दिया। सारठ क्षेत्र भी निकटस्थ शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ गया। सड़कों से जुड़ने और नदियों से निकटता की वजह से आसपास के लोग भी सारठ में आकर बसने लगे।
* प्लेग का प्रभाव कम हो चूका था। ज़िन्दगी वापस पटरी पर आ रही थी। धीरे धीरे लोगों ने नयी परिस्थियों में अपने आप को ढाल कर जीना सीख लिया था। जनजागरण की लहर शहरों से लेकर गाँव तक फ़ैल रही थी। साथ ही अंग्रेजी शिक्षा भी अब धीरे धीरे सुदूर इलाकों तक पहुँच रही थी। गाँव -कस्बों के लोग धीरे धीरे शिक्षित हो रहे थे। सड़कों का निर्माण होने की वजह से धीरे धीरे सारठ गाँव, आस पास के इलाके के लिए ब्यापार का केंद्र बनने लगा। परन्तु अब भी सुविधाओं और साधनो की भारी कमी थी।बैलगाड़ी यातायात एवं मालवाहन का प्रमुख साधन था। ज़रुरत की चीज़ों की पूर्ती के लिए टोलों- मुहल्लों में वस्तु -विनिमय की परंपरा आप बात थी। आसपास के इलाके में चिकित्सा की सुविधा नहीं के बराबर थी। कहते हैं कि जब परिस्थितियां प्रतिकूल हों और आस पास के सभी लोग इन परिस्थितियों से सामान रूप से पीड़ित हों , तब अचानक ही लोगों में एक आपसी सहयोग की अद्भुत भावना पैदा हो जाती है। लोग सहज ही एक दुसरे की तकलीफों में मदद करने आगे आ जाते हैं। पूरे देश में फैली समान शोषण ब्यवस्था की वजह से ही शायद यहां के गाँव में आपसी सहयोग की भावना यहां के गाँव की मूल प्रकृति बन गयी है। बिना किसी नफा नुकसान का आकलन किये , लोग एक दुसरे की मदद को आगे आ जाते हैं। इसके विपरीत अगर गाँव में बस रहे एक समुदाय के साथ दूसरे इलाके के अपरिचित लोग रहने आ जाते हैं तो सीमित संसाधनों /ज़मीनों की खातिर दोनों समुदायों के बीच एक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है , जिसका दूरगामी प्रभाव वर्त्तमान के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों पर भी पड़ता है। जब आसपास के गाँव के लोग सारठ में आकर बसने लगे तो तो इसकी वजह से यहां पहले से रह रहे समाज का संतुलन बिगड़ा और कुछ हद तक संघर्ष की स्थिति भी उत्पन्न हुई। यह बात और है कि संघर्ष , सहयोग और नयी चुनौतियों के बीच एक नए सामुदायिक संतुलन का जन्म होता है। बभनटोला का छोटा समुदाय भी समय -समय पर बदलते सामुदायिक सहयोग और संतुलन का साक्षी बना।
*सन १९१६ में श्री नवाब पोद्दार की पत्नी किसी बड़ी बीमारी का शिकार हो गयी और फिर १९१७ आते आते दुनिया से चल बसीं। यह इस परिवार के लिए एक बहुत बड़ा हादसा था। पहले तो श्री नवाब पोद्दार की सभी संतानों का बाल्यावस्था में ही दिवंगत हो जाना और फिर बीमार पत्नी का स्वर्ग सिधार जाना। इस घटना ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया था। उधर श्री राजा पोद्दार भी नावल्द रह गए थे। दोनों भाइयों की उम्र भी ३0 के पार हो चुकी थी। वंश आगे बढ़ने की सारी उम्मीदें धूमिल हो चुकी थीं। ऐसा लग रहा था की श्री भूषण पोद्दार ,जिनकी पीढ़ी सन १८०० ई ० से किसी प्रकार आगे बढ़ती आ रही थी, के वंश को आगे बढ़ाने की अब कोई उम्मीद नहीं बची थी। आसपास के गाँव वाले भी सारठ बस्ती के स्वर्णकार समाज से पारिवारिक सम्बन्ध बनाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिख्हते थे।
* जब किसी समुदाय अथवा परिवार पर एक के बाद विपदाएं आती हों , खासकर ऐसी, जिनसे पूरे वंश का अस्तित्व ही खतरे में पड जाय , तो अक्सर ऐसे में इसे किसी दैवी प्रकोप का परिणाम मान लिया जाता है। देवी देवताओं के प्रति पूर्ण समर्पण और उनकी कृपा प्राप्ति कर आगे बढ़ना , भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है। ऐसा माना जाता है कि अकाल, बीमारी और शोषण के बीच जूझती जिंदगियों ने एक लम्बे समय से पोद्दार परिवार में नियमित पूजा पाठ की परंपरा को भुला दिया था। बाभन टोला में जो थोड़े बहुत पोद्दार परिवार के सदस्य बच गए थे , उनके रिश्तेदारों,(जो आसपास के गाँव में रहते थे ) , ने समझाया कि घर में नियमित पूजा -पाठ का न होना ही पोद्दार परिवार पर एक के बाद एक आनेवाली विपत्ति का कारण है। उन्होंने भविष्य की आपदाओं से बचने के लिए घर में "कुलदेवी" की स्थापना करने की सलाह दे डाली। इसके तुरंत बाद घर में कुलदेवी की स्थापना की गयी। कुलदेवी की पूजा की वो परंपरा , जो आज से लगभग १०० वर्ष पूर्व आरम्भ हुई थी , आज भी कायम है।
* श्री नवाब पोद्दार की उम्र ३५ के पार हो चुकी थी। उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था , परन्तु कोई जीवित संतान नहीं थी. उधर श्री राजा पोद्दार भी नावल्द ही रह गए थे। वंश बिलकुल समाप्ति के कगार पर था। श्री राजा पोद्दार की माँ , बभनगामा गाँव से थी। बभनगामा में अपने रिश्तेदारों के यहां उनका अक्सर आना जाना होता था। एकबार किसी पारिवारिक कार्यक्रम में उन्हें बभनगामा जाना पड़ा। वहाँ से वापस लौटते समय वह अपने रिश्तेदार की एक बच्ची, जिसकी उम्र लगभग ७ वर्ष रही होगी, को ले आयी। उसका नाम "देवी कुमारी " था। उसके माता पिता को यह आश्वाशन दिया की दो-चार दिनों में देवी को वापस बभनगाम पहुंचा दिया जाएगा। वह बच्ची , इस उत्सुकता से कि नया गाँव, नयी जगह देखने को मिलेगा , ख़ुशी ख़ुशी उनके साथ सारठ आ गयी। उधर बहला फुसलाकर , बिना उसके माता -पिता की अनुमति के , देवी कुमारी का विवाह श्री नवाब पोद्दार से कर दिया गया। बाद में उसके माता-पिता को यह आश्वासन देकर समझा दिया गया की यह लड़की अकेले पोद्दार परिवार की संपत्ति की मालकिन बनेगी। उम्र के इतने बड़े फासले के बावजूद विवाह इस उम्मीद से की गयी थी की शायद कोई चमत्कार हो जाए और पोद्दार वंश समाप्त होने से बच जाए। शायद नियति को भी यही मंज़ूर था। साथ ही , किसी अपशकुन, ब्यवधान या अनहोनी से बचने के लिए आस्था का सहारा लिया जाने लगा। घर में स्थापित कुलदेवी की अत्यंत भक्ति-भाव से नियमित पूजा की जाने लगी। भभनगामा में स्थित परिजनों से अच्छे सम्बन्ध थे. अतः, यथासंभव उन्होंने भी पोद्दार परिवार को, जब जरूरत पड़ी , सहयोग किया। कहते हैं कि , इस परिवार में दो-तीन पीढ़ियों पहले भी कुलदेवी की प्रथा थी , परन्तु उनका समुचित सम्मान और पूजा-पाठ नहीं होने की वजह से परिवार पर एक के बाद एक विपत्तियों का पहाड़ टूटने लगा।
* देवी कुमारी , जिसे बाद में मैया के नाम से सम्मान मिला , भी जल्द ही सारठ के पोद्दार परिवार से घुल मिल गयीं और पूरे उत्साह और समर्पण भाव से परिवार परम्पराओं का निर्वाह करने लगी. परिवार के लोगों ने भी बड़े ही सम्मान के साथ उनका लालन पालन किया। मात्र ७ वर्ष की उम्र में वो इस घर में आयी थी। मगर शायद उनकी कर्मभूमि पहले से ही तय थी।यह १९२० के आसपास का वक्त था और देश में स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर था। खैर, सारठ के पोद्दार बस्ती में ही देवी कुमारी का बड़े यतन से ललन पालन हुआ। मैया (देबि कुमारी ) ने भी बड़े यतन से घर गृहस्थी को सम्हालना शुरू कर दिया। मैया का आगमन ने पोद्दार वंश की कहानी को एक निर्णायक मोड़ प्रदान किया। संघर्ष की लीला चलती रही। इन संघर्षों में नए आयाम जुड़ते चले गए। किन्तु इन्ही प्रतिकूलताओं ने एक नए आत्मबल को जन्म दिया। साधन नहीं थे, सहयोग करने वाले नहीं थे, लेकिन आत्मा बल का सहारा था। इन्ही को सम्बल बनाकर पोद्दार परिवार जीवन के संघर्षों से जूझता हुआ आगे पढ़ रहा था। इसके आगे की कहानी मैया और उनके पुत्रों के अनवरत संघर्ष की कहानी है। मैं ,सारठ का पोद्दार निवास इन संघर्षों का साक्षी रहा हूँ। आज की पीढ़ियां शायद उन परिस्थितियों की कल्पना भी नहीं कर सकती।
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* अन्य समुदायों की तरह सारठ का स्वर्णकार समुदाय भी मुख्य रूप से कृषि पर आश्रित था। साथ ही इस समुदाय के लोग स्वर्ण-कारीगरी के कुटीर उद्योग में भी शामिल थे। ऐसा माना जाता है कि किसी समय पोद्दार परिवार के मुखिया ठाकुर साहब के घर में आभूषण बनाने का काम करते थे। इस काम के एवज में उस समय के ठाकुर साहब ने उन्हें सारठ गाँव में कुछ ज़मीन (करीब १५ बीघा) पुरस्कार स्वरुप प्रदान की थी जिससे कि पोद्दार परिवार खेती कर अपना गुजर बसर कर सके। आज भी यह कृषि भूमि पोद्दार परिवार की अमूल्य धरोहर है। इसे हम लोहचीबाद और डाबर के नाम से जानते हैं।ज़मीनों के आधिपत्य की कोई ठोस ब्यवस्था नही होने के कारण ठाकुर साहब ने जिसको जो ज़मीन आबंटित कर दी वही उसकी ज़मीन मान ली जाती थी। बाद में ज़मीनों का अधिपत्य इस आधार पर निर्धारित होने लगा कि कौन किस ज़मीन पर वर्षों से खेती कर रहा है। समयांतराल में ज़मीन का आधिपत्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित होने लगा।
* स्वर्ण कारीगरी से अर्जित आय के अतिरिक्त ठाकुर साहब द्वारा दी गयी ज़मीन ही पोद्दार परिवार की आजीविका का मुख्य आधार था। सीमित आमदनी में कई हिस्सों में बंटे पोद्दार परिवार का भरण पोषण करना पड़ता था। सभी सदस्य एक सीमित दायरे में मिल-जुलकर रहते थे। संयुक्त परिवार की परंपरा आम बात थी। मुसीबत के वक्त एक दुसरे की मदद के लिए आगे आना भी रीति-रिवाज का हिस्सा था। आस-पास के गाँव स्थित स्वर्णकार समाज से भी ब्यवसायिक और सामाजिक सम्बन्ध अच्छे थे। लेकिन कुल मिलाकर सारठ की कर्मभूमि ही आजीविका और सामाजिक जीवन का मुख्य आधार थी। जैसा कि १९वी सदी के हिन्दुस्तान में आम बात थी , इस परिवार के पुरखों की भी औसत आयु ४५-५० वर्षों तक ही सीमित थी। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच आम तौर पर १८-२० वर्षों का फासला था। ऐसी, सामजिक आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच पोद्दार वंश के पुरखे किसी तरह से अपना अस्तित्व बचाने की जद्दो-जहद कर रहे थे।
* २० वीं सदी के पूर्वार्ध तक पोद्दार -बस्ती कुछ झोपड़ीनुमा घरों के रूप में विद्यमान थी। मिटटी की दीवारें , फूस के छप्पर और लकड़ियों के दरवाजे। हर घर में एक आंगन ज़रूर होता था। अक्सर आँगन के बीच में तुलसी -पिंड स्थापित किया जाता था। परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त पशुओं के लिए भी रहने की ब्यवस्था होती थी। यूं कहें मवेशी भी परिवार के अभिन्न अंग होते थे। पशु और मनुष्य दोनों एक दुसरे पर आश्रित होते थे। पानी के लिए घर में कोई ब्यवस्था नहीं होती थी। या तो गांव के छोर पर बहती अजय नदी पर निर्भर रहना पड़ता था अथवा गाँव/टोले में स्थित सामुदायिक कुँए पर। कुल मिलाकर जीवन पद्धति बिलकुल सरल होती थी।
* बीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच जीवन शैली , आर्थिक गतिविधियां अथवा आर्थिक स्थिति में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ। हाँ परिवार की शाखाएं बढ़ती गयीं और कुछ हद तक पोद्दार -बस्ती का स्वरुप भी बीच बीच में परिवर्तित हुआ। बस्ती घंनी होती गयी और कुछ लोग विस्थापित होकर , सारवां , पालोजोरी या बभनगामा में जा बसे। इन विस्थापनों के बावजूद , पोद्दार परिवार की मूल शाखा और इसके अधिकांश लोग सारठ के सोनार टोला में ही निवास करते थे।
* अगर सत्ताएं दमनकारी एवं संवेदनहीन हों तो रैयतों को ऐसी ब्यवस्था का खामियाजा कई तरह से भुगतना पड़ता है। ब्रिटिश सत्ता का केंद्र बंगाल में होने की वजह से यहां के लोग ऐसी शोषणकारी और संवेदनहीन ब्यवस्था से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। १८ वीं सदी का बीभत्स अकाल (१७७० ईस्वी) जिसमे बंगाल प्रांत की एक तिहाई से भी अधिक आबादी समूल नष्ट हो गयी , ब्रिटिश हुकूमत की इसी दमनकारी राजस्व नीति का परिणाम था। पोद्दार वंश के कितने लोग इस आपदा के शिकार हुए , इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु ऐसा स्पष्ट तौर पर माना जा सकता है कि, यह वंश लगभग समूल विनाश के कगार पर पहुँच गया था और बमुश्किल थोड़े बहुत लोग ही किसी तरह उस अकाल की विनाशलीला से बच पाए । जो थोड़े लोग बच पाए वो अपने को खुशकिस्मत समझते थे , भले ही उनको अत्याचारी शाषन - ब्यवस्था तले जानवरों की तरह ही ज़िन्दगी क्यों न नसीब हो। न जाने कितने लोगों को अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ा और कितनी ही भावी पीढ़ियां जो नयी शाखाओं का रूप ले सकती थीं , अचानक समाप्त हो गयी । मगर बंगाल प्रान्त में पीढ़ियों को बड़े स्तर पर समाप्त करने वाली ये आखिरी आपदा नहीं थी. इस भीषण अकाल के बाद १७ ७३, १८६६ , १८७३ , १८९२ और १८९७ ईo में भी बंगाल प्रान्त के लोगों को कई अकालों का सामना करना पड़ा। इन अकालों के पीछे प्रतिकूल मानसून के साथ साथ अंग्रेजों की दमनकारी कर नीति का भी भरपूर योगदान था।
मानो अकालों की श्रृंखला जनजीवन को तबाह करने के लिए काफी नहीं थी, १९वीं सदी के अंतिम दशक में प्लेग की महामारी ने विकराल रूप लेकर बंगाल प्रांत में परिवारों /समुदायों को निगलना शुरू कर दिया. अनुमानतः १८९६ से १९०५ के बीच करीब एक करोड़ लोग प्लेग की वजह से अपना जीवन गँवा बैठे।** संथाल परगना क्षेत्र में लाखों लोगों की जाने इस त्रासदी में चली गयी. पोद्दार कुल के जो लोग इस भयानक महामारी से किसी तरह बच पाए , उन्होंने अपनी आँखों देखी इस विनाश लीला को नम आँखों से अपनी आगे की पीढ़ियों को बताया। कहते हैं कि मृत्यलीला का मंज़र कुछ इस तरह था कि किसी एक परिवार में अगर एक सदस्य को प्लेग की बीमारी ने जकड लिया तो उसके साथ साथ दो -तीन और सदस्य जो उसकी देखभाल में लगे थे, उनकी भी कुछ सप्ताहों के अंदर ही मृत्यु तय थी । किसी गाँव में अगर एक सदस्य को भी प्लेग की बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया , तो फिर पूरा का पूरा गाँव जल्दी ही इस महामारी की चपेट में आ जाता था। आलम यह था कि जब तक परिवार के लोग एक सदस्य का दाह संस्कार करके लौटते , तब तक किसी दुसरे सदस्य की मृत्यु हो चुकी होती थी। इस महामारी ने बच्चे, वयस्क, वृद्ध , स्त्री, पुरुष सबको अपनी चपेट में लिया। । नतीजा यह रहा की पोद्दार वंश की कुछेक शाखाओं को छोड़कर , बाकी सभी शाखाएं समाप्त हो गयी। दो तीन वर्षों के अंतराल में ही पोद्दार परिवार के ३०-४० सदस्यों की मृत्यु हो गयी। श्री नवाब पोद्दार (जन्म वर्ष १८८६ ) ऐसे कुछ भाग्यशाली सदस्यों में थे , जो अपनी खुद की जीवन लीला समाप्त होने के पहले अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ाने में कामयाब हो पाए। वहीं चचेरे भाइयों या उनके चाचाओं की पीढ़ियां आगे बढ़ने में नाकामयाब रहीं। लगभग विलुप्त होने के कगार पर खड़ी , पोद्दार वंश की आगे की कहानी , वस्तुतः श्री नवाब पोद्दार के वंशजों के संघर्ष, उत्थान और विस्तार की कहानी है।
**Reference: Indian Medical Journal Oct 1906. [Plague in Bengal].
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1800 ईo के आसपास श्री भूषन पोद्दार और उनके भाई श्री बनवारी पोद्दार इस परिवार के मुखिया थे। कालन्तराल में इन दोनों भाइयों का वंश कई शाखाओं में आगे बढा ,परन्तु इनके अधिकाँश वंशज अल्पायु में ही स्वर्ग सिधार गए। बीसवीं सदी के आते आते इनके वंश को आगे बढ़ाने वाले सिर्फ तीन ही वंशज बचे थे- श्री राजा पोद्दार ,श्री नवाब पोद्दार और श्री गुहि पोद्दार। राजा पोद्दार नवाब पोद्दार के चचेरे बड़े भाई थे। गुहि पोद्दार नवाब पोद्दार के गोतिया थे और दूर के चचेरे भाई थे। वस्तुतः वंशावली में छह पायदान ऊपर , श्री गुहि पोद्दार और श्री नवाब पोद्दार के पूर्वज सहोदर भाई थे। श्री नवाब पोद्दार के पिता श्री कारु पोद्दार और उनके बड़े भाई श्री प्रजापति पोद्दार सारठ के ठाकुर साहब के यहां स्वर्ण कारीगरी का काम किया करते थे। चूंकि ठाकुर साहब को इलाके में लगभग राजा का स्थान हासिल था, उनकी हवेली में जेवर- जेवरात बनाने का काम सालों भर चलता रहता था। श्री कारु पोद्दार और श्री प्रजापति पोद्दार को जब भी स्वर्ण कारीगरी के लिए बुलावा आता उन्हें ठाकुर साहब की हवेली में हाज़िर होना पड़ता। इस कार्य के पारिश्रमिक के रूप में ठाकुर साहब ने उन्हें दो अलग अलग जगहों पर -कुल मिलाकर लगभग १५ बीघे की ज़मीन दान कर दी थी जिससे की वे अपने परिवार का गुजर बसर कर सकें। इन भू-खण्डों को हम लोहछिबाद और डाबर के नाम से जानते हैं। स्वर्णकारीगरी के अतिरिक्त लोहछिबाद और डाबर के खेतों से प्राप्त कृषि उत्पाद इस परिवार के जीवन यापन का मुख्य आधार था। कृषि उत्पादों का क्रय विक्रय नहीं किया जाता था। खुद की ज़रूरतें पूरी करने के बाद जो बच जाता उसका कुछ हिस्सा भविष्य की ज़रूरतों के लिए संचित कर दिया जाता और कुछ पड़ोसियों /ज़रूरतमंदों को बाँट दिया जाता था. घर में पल रहे मवेशियों की खाद्यपूर्ति भी इन्ही कृषि उत्पादों से होती थी। घर में आये अतिथियों का यथासंभव विशेष सत्कार होता था। घर आये अतिथियों को भोजन कराना और उपहार स्वरुप कुछ अन्नदान करना पारिवारिक परंपरा का हिस्सा था. अतिथियों , परिजनों के विशेष सत्कार की यह परंपरा पीढ़ियों दर पीढ़ियों आगे बढ़ती रही। कुल मिलाकर संघर्षपूर्ण ही सही पर संतोषपूर्ण जीवन यापन चल रहा था।
* श्री गुहि पोद्दार के दो पुत्र हुए - श्री अस्ति पोद्दार और श्री किशोरी पोद्दार। श्री किशोरी पोद्दार ने सांसारिक मोहमाया को त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लिया , परन्तु श्री अस्ति पोद्दार के वंशज आज भी सारठ के बाभन टोला में निवास करते हैं। अपने पुरखों की भाँति श्री अस्ति पोद्दार भी स्वर्ण कारीगरी का काम किया करते थे। परन्तु उनके पुत्रों ने न तो इस कला को सीखा और न ही इस ब्यापार को आगे बढ़ाने में कोई दिलचस्पी दिखाई।
* उधर श्री कारू पोद्दार और श्री प्रजापति पोद्दार के वंशजों की कहानी बिलकुल अलग राह पर चल रही थी। श्री कारू पोद्दार और श्री प्रजापति पोद्दार मुख्य रूप से ठाकुर साहब के यहां स्वर्ण कारी गारी करते थे।साथ ही उनके द्वारा दी गयी ज़मीन पर खेती बारी का काम सम्हालते थे। ठाकुर साहब के परिवार के संपर्क में रहने की वजह से अक्सर इन दोनों भाइयों पर ठाकुर साहब की कृपा बनी रहती थी। किसी मुसीबत में वे ठाकुर साहब से मदद की गुहार लगा कर सकते थे। इसका लाभ कुछ हद तक उनके पुत्रों को भी प्राप्त हुआ। इन दोनों भाइयों के बाद श्री नवाब पोद्दार और श्री राजा पोद्दार कारीगरी का काम सम्हालने लगे। परन्तु ठाकुर साहब की हवेली पर नियमित जाना नहीं होता था। कभी-कभी ही बुलावा आता था। सोने चांदी का कारोबार घर से ही चलता था। घर के सबसे बाहरी कमरे को दुकान में तब्दील कर दिया गया था। दोनों चचेरे भाई मिल जुलकर कारोबार सम्हालते थे। अन्य सगे-सम्बन्धी भी उसी पोद्दार बस्ती में रहते थे , परन्तु ये दोनों चचेरे भाई एक संयुक्त परिवार की तरह साथ साथ रहते थे। दोनों में काफी मेल था। प्लेग की तबाही के बाद इनके कुछ सगे सम्बन्धी वंशहीन हो स्वर्ग सिधार गए और कुछ अन्य गाँव छोड़कर बाहर चले गए। उनके हिस्से का घर और ज़मीन इन दोनों भाइयों के अधिकार क्षेत्र में आ गया।
* सन २० वीं सदी के पहले दशक तक दोनों भाइयों की शादी हो चुकी थी । संघर्ष का सिलसिला ज़ारी था। प्लेग के तांडव से इनका अपना परिवार भी अछूता नहीं था। श्री राजा पोद्दार की संतान और उनकी पत्नी प्लेग महामारी की भेंट चढ गए। नतीजतन उनका वंश आगे न बढ़ सका। उनके पिता श्री प्रजापति पोद्दार भी स्वर्ग सिधार चुके थे। उधर श्री नवाब पोद्दार की कई संताने हुईं पर सभी बाल्यावस्था में ही काल की भेंट चढ़ गए। २०१० आते आते श्री कारु पोद्दार और उनकी पत्नी का भी देहांत हो चूका था। पोद्दार परिवार में अब बस श्री नवाब पोद्दार , श्री राजा पोद्दार , श्री नवाब पोद्दार की पत्नी और श्री राजा पोद्दार की बूढी माँ बच गयी थी। कारोबार चल रहा था, खेती बारी भी हो रही थी , परन्तु परिवार पर हमेशा किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती थी।
* उधर प्रान्त में स्वदेशी आंदोलन चरम पर था। आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत के सारे प्रशाशनिक तंत्र सक्रिय हो उठे थे। ज़मींदार भी बढ़ चढ़कर इस आंदोलन का हिस्सा बने। आंदोलन का केंद्र बिंदु बंगाल था , अतः आंदोलन का प्रभाव सबसे अधिक इसी प्रान्त मे देखने को मिला. जहां एक ओर अधिकाँश ज़मींदार अंग्रेज़ों का साथ दे रहे थे, वहीं कुछ स्वाभिमानी ज़मींदार भी थे जो आंदोलन का साथ देते नज़र आये। हुकूमत ने आंदोलन की एकता को भंग करने के लिए बंगाल का विभाजन कर दिया, पर इस क़दम ने आंदोलन की आग को और अधिक भड़काया। सारे देश में राष्ट्रीयता की एक नयी भावना जन्म ले रही थी। इसका असर सारठ क्षेत्र पर भी देखने को मिला। स्वदेशी विचार से प्रेरित होकर यहां के लोगों ने भी खेती के साथ -साथ कई प्रकार के हथकरघा और कुटीर उद्योग प्रारम्भ किये। लोगों के दिलों में स्वदेशी की भावना जन्म ले चुकी थी। कहते है की जब जीने के लिए कोई बड़ा उद्देश्य सामने दिख जाय, तो ऐसे में ब्यक्तिगत जीवन की तकलीफें गौण हो जाती हैं। सारे प्रदेश में स्वदेशी आंदोलन की लहर ने लोगों को प्लेग के महासंकट से उबरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लोगों ने अपने अनगिनत प्रियजनों की अकाल मृत्यु के अपरिमित कष्टों को भूलकर एक नए सुबह की उम्मीद में नए उत्साह से जीना शुरू कर दिया। दूसरी और सरकार ने अपने प्रशाशन तंत्र को मज़बूत करने के लिए गाँवों और शहरों को सड़कों से जोड़ना शुरु कर दिया। सारठ क्षेत्र भी निकटस्थ शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ गया। सड़कों से जुड़ने और नदियों से निकटता की वजह से आसपास के लोग भी सारठ में आकर बसने लगे।
* प्लेग का प्रभाव कम हो चूका था। ज़िन्दगी वापस पटरी पर आ रही थी। धीरे धीरे लोगों ने नयी परिस्थियों में अपने आप को ढाल कर जीना सीख लिया था। जनजागरण की लहर शहरों से लेकर गाँव तक फ़ैल रही थी। साथ ही अंग्रेजी शिक्षा भी अब धीरे धीरे सुदूर इलाकों तक पहुँच रही थी। गाँव -कस्बों के लोग धीरे धीरे शिक्षित हो रहे थे। सड़कों का निर्माण होने की वजह से धीरे धीरे सारठ गाँव, आस पास के इलाके के लिए ब्यापार का केंद्र बनने लगा। परन्तु अब भी सुविधाओं और साधनो की भारी कमी थी।बैलगाड़ी यातायात एवं मालवाहन का प्रमुख साधन था। ज़रुरत की चीज़ों की पूर्ती के लिए टोलों- मुहल्लों में वस्तु -विनिमय की परंपरा आप बात थी। आसपास के इलाके में चिकित्सा की सुविधा नहीं के बराबर थी। कहते हैं कि जब परिस्थितियां प्रतिकूल हों और आस पास के सभी लोग इन परिस्थितियों से सामान रूप से पीड़ित हों , तब अचानक ही लोगों में एक आपसी सहयोग की अद्भुत भावना पैदा हो जाती है। लोग सहज ही एक दुसरे की तकलीफों में मदद करने आगे आ जाते हैं। पूरे देश में फैली समान शोषण ब्यवस्था की वजह से ही शायद यहां के गाँव में आपसी सहयोग की भावना यहां के गाँव की मूल प्रकृति बन गयी है। बिना किसी नफा नुकसान का आकलन किये , लोग एक दुसरे की मदद को आगे आ जाते हैं। इसके विपरीत अगर गाँव में बस रहे एक समुदाय के साथ दूसरे इलाके के अपरिचित लोग रहने आ जाते हैं तो सीमित संसाधनों /ज़मीनों की खातिर दोनों समुदायों के बीच एक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है , जिसका दूरगामी प्रभाव वर्त्तमान के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों पर भी पड़ता है। जब आसपास के गाँव के लोग सारठ में आकर बसने लगे तो तो इसकी वजह से यहां पहले से रह रहे समाज का संतुलन बिगड़ा और कुछ हद तक संघर्ष की स्थिति भी उत्पन्न हुई। यह बात और है कि संघर्ष , सहयोग और नयी चुनौतियों के बीच एक नए सामुदायिक संतुलन का जन्म होता है। बभनटोला का छोटा समुदाय भी समय -समय पर बदलते सामुदायिक सहयोग और संतुलन का साक्षी बना।
*सन १९१६ में श्री नवाब पोद्दार की पत्नी किसी बड़ी बीमारी का शिकार हो गयी और फिर १९१७ आते आते दुनिया से चल बसीं। यह इस परिवार के लिए एक बहुत बड़ा हादसा था। पहले तो श्री नवाब पोद्दार की सभी संतानों का बाल्यावस्था में ही दिवंगत हो जाना और फिर बीमार पत्नी का स्वर्ग सिधार जाना। इस घटना ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया था। उधर श्री राजा पोद्दार भी नावल्द रह गए थे। दोनों भाइयों की उम्र भी ३0 के पार हो चुकी थी। वंश आगे बढ़ने की सारी उम्मीदें धूमिल हो चुकी थीं। ऐसा लग रहा था की श्री भूषण पोद्दार ,जिनकी पीढ़ी सन १८०० ई ० से किसी प्रकार आगे बढ़ती आ रही थी, के वंश को आगे बढ़ाने की अब कोई उम्मीद नहीं बची थी। आसपास के गाँव वाले भी सारठ बस्ती के स्वर्णकार समाज से पारिवारिक सम्बन्ध बनाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिख्हते थे।
* जब किसी समुदाय अथवा परिवार पर एक के बाद विपदाएं आती हों , खासकर ऐसी, जिनसे पूरे वंश का अस्तित्व ही खतरे में पड जाय , तो अक्सर ऐसे में इसे किसी दैवी प्रकोप का परिणाम मान लिया जाता है। देवी देवताओं के प्रति पूर्ण समर्पण और उनकी कृपा प्राप्ति कर आगे बढ़ना , भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है। ऐसा माना जाता है कि अकाल, बीमारी और शोषण के बीच जूझती जिंदगियों ने एक लम्बे समय से पोद्दार परिवार में नियमित पूजा पाठ की परंपरा को भुला दिया था। बाभन टोला में जो थोड़े बहुत पोद्दार परिवार के सदस्य बच गए थे , उनके रिश्तेदारों,(जो आसपास के गाँव में रहते थे ) , ने समझाया कि घर में नियमित पूजा -पाठ का न होना ही पोद्दार परिवार पर एक के बाद एक आनेवाली विपत्ति का कारण है। उन्होंने भविष्य की आपदाओं से बचने के लिए घर में "कुलदेवी" की स्थापना करने की सलाह दे डाली। इसके तुरंत बाद घर में कुलदेवी की स्थापना की गयी। कुलदेवी की पूजा की वो परंपरा , जो आज से लगभग १०० वर्ष पूर्व आरम्भ हुई थी , आज भी कायम है।
* श्री नवाब पोद्दार की उम्र ३५ के पार हो चुकी थी। उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था , परन्तु कोई जीवित संतान नहीं थी. उधर श्री राजा पोद्दार भी नावल्द ही रह गए थे। वंश बिलकुल समाप्ति के कगार पर था। श्री राजा पोद्दार की माँ , बभनगामा गाँव से थी। बभनगामा में अपने रिश्तेदारों के यहां उनका अक्सर आना जाना होता था। एकबार किसी पारिवारिक कार्यक्रम में उन्हें बभनगामा जाना पड़ा। वहाँ से वापस लौटते समय वह अपने रिश्तेदार की एक बच्ची, जिसकी उम्र लगभग ७ वर्ष रही होगी, को ले आयी। उसका नाम "देवी कुमारी " था। उसके माता पिता को यह आश्वाशन दिया की दो-चार दिनों में देवी को वापस बभनगाम पहुंचा दिया जाएगा। वह बच्ची , इस उत्सुकता से कि नया गाँव, नयी जगह देखने को मिलेगा , ख़ुशी ख़ुशी उनके साथ सारठ आ गयी। उधर बहला फुसलाकर , बिना उसके माता -पिता की अनुमति के , देवी कुमारी का विवाह श्री नवाब पोद्दार से कर दिया गया। बाद में उसके माता-पिता को यह आश्वासन देकर समझा दिया गया की यह लड़की अकेले पोद्दार परिवार की संपत्ति की मालकिन बनेगी। उम्र के इतने बड़े फासले के बावजूद विवाह इस उम्मीद से की गयी थी की शायद कोई चमत्कार हो जाए और पोद्दार वंश समाप्त होने से बच जाए। शायद नियति को भी यही मंज़ूर था। साथ ही , किसी अपशकुन, ब्यवधान या अनहोनी से बचने के लिए आस्था का सहारा लिया जाने लगा। घर में स्थापित कुलदेवी की अत्यंत भक्ति-भाव से नियमित पूजा की जाने लगी। भभनगामा में स्थित परिजनों से अच्छे सम्बन्ध थे. अतः, यथासंभव उन्होंने भी पोद्दार परिवार को, जब जरूरत पड़ी , सहयोग किया। कहते हैं कि , इस परिवार में दो-तीन पीढ़ियों पहले भी कुलदेवी की प्रथा थी , परन्तु उनका समुचित सम्मान और पूजा-पाठ नहीं होने की वजह से परिवार पर एक के बाद एक विपत्तियों का पहाड़ टूटने लगा।
* देवी कुमारी , जिसे बाद में मैया के नाम से सम्मान मिला , भी जल्द ही सारठ के पोद्दार परिवार से घुल मिल गयीं और पूरे उत्साह और समर्पण भाव से परिवार परम्पराओं का निर्वाह करने लगी. परिवार के लोगों ने भी बड़े ही सम्मान के साथ उनका लालन पालन किया। मात्र ७ वर्ष की उम्र में वो इस घर में आयी थी। मगर शायद उनकी कर्मभूमि पहले से ही तय थी।यह १९२० के आसपास का वक्त था और देश में स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर था। खैर, सारठ के पोद्दार बस्ती में ही देवी कुमारी का बड़े यतन से ललन पालन हुआ। मैया (देबि कुमारी ) ने भी बड़े यतन से घर गृहस्थी को सम्हालना शुरू कर दिया। मैया का आगमन ने पोद्दार वंश की कहानी को एक निर्णायक मोड़ प्रदान किया। संघर्ष की लीला चलती रही। इन संघर्षों में नए आयाम जुड़ते चले गए। किन्तु इन्ही प्रतिकूलताओं ने एक नए आत्मबल को जन्म दिया। साधन नहीं थे, सहयोग करने वाले नहीं थे, लेकिन आत्मा बल का सहारा था। इन्ही को सम्बल बनाकर पोद्दार परिवार जीवन के संघर्षों से जूझता हुआ आगे पढ़ रहा था। इसके आगे की कहानी मैया और उनके पुत्रों के अनवरत संघर्ष की कहानी है। मैं ,सारठ का पोद्दार निवास इन संघर्षों का साक्षी रहा हूँ। आज की पीढ़ियां शायद उन परिस्थितियों की कल्पना भी नहीं कर सकती।
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मैया का संघर्ष
मैया का सारठ में आगमन १९२० ईस्वी के आसपास हुआ था। उस समय उनकी उम्र करीब ७ वर्ष रही होगी। पोद्दार परिवार कई प्रकार के संकटों से जूझ रहा था।
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