दिल्ली हो या फिर ढाका हो
कर में प्याला मदिरा का हो
फिर हार जीत की फिक्र किसे?
हो चमत्कार कुछ फ़िक्र किसे?
हम तो मस्ती में पीते हैं
जीवन जी भर कर जीते हैं.
काहू से कोई बैर नहीं
सब अपने हैं कोई गैर नहीं।
तुम नीम्बू पानी वाले ही
यूँ ही बस शीश खपाते हो।
कुछ बेफजूल की बातों पर
जाने क्या सुख तुम पाते हो?
ये अपना है वो बेगाना
नीम्बू पानी सिखलाता है
सारा जग है संगी साथी
ये मदिरालय बतलाता है।
एक बात अगर कहना मानो
तुम भी सच पाने की ठानो।
कल से तुम मदिरालय आओ
मदिरा का प्याला अपनाओ।
फिर ये जीवन सतरंगी है।
फिर सारे साथी संगी हैं।
ना यहाँ मुसलमाँ है कोई ,
ना ही मनुवादी संघी है।
हम मदिरा धर्म निभाते हैं
अरि को भी गले लगाते हैं।
सीधे सच्चे दिलवाले हैं।
सम्बल जीवन के प्याले हैं।
हम यहां अबीरी - स्पर्श बिना
दिल की दीवार ढहाते हैं,
चीयर्स बोलकर ही अपने
दुश्मन को दोस्त बनाते हैं।
चेहरे पर मेरे मत जाना
ये सत्य बयां कब करते हैं ?
दिल के रहस्य के अन्वेषी ,
मदिरा की राह गुजरते हैं।
मिल जाती प्याले संग लिए
जब हम मित्रों की टोली है ,
हर शाम हमारी दीवाली,
हर सुबह हमारी होली है।
(अबीरी स्पर्श : गुलाल लिए हाथों का स्पर्श - होली के दिन )
(This poem was written on the day of Holi on 24th March 2016. Immediately, a day before, in a close World T20 encounter India won a close match against Bangladesh. Reference to Delhi and Dhaka is in the context of this match)
No comments:
Post a Comment